पंचायत स्तर पर बच्चों की स्थिति की होगी निगरानी राजधानी रांची के भीतर उन तमाम बच्चों की पहचान करने के लिए एक विशेष और विस्तृत अभियान का आगाज किया गया है जो विभिन्न कारणों से अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ चुके हैं। इस पूरी मुहिम के अंतर्गत स्थानीय पंचायत स्तर पर एक मजबूत निगरानी तंत्र स्थापित किया जा रहा है, जिसकी मदद से प्रत्येक बच्चे की शैक्षणिक स्थिति और उसकी उपस्थिति पर लगातार नजर रखी जाएगी। शिक्षा विभाग के निर्देशानुसार पंचायत के नुमाइंदों और स्थानीय समितियों को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे अपने क्षेत्र के ऐसे बच्चों का पूरा आंकड़ा तैयार करें जो विद्यालयों से दूर हैं। इस व्यवस्था के जरिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कोई भी बच्चा बुनियादी शिक्षा से वंचित न रहे और ग्रामीण तथा अर्ध-शहरी इलाकों में भी पढ़ाई का माहौल बेहतर हो सके।
पढ़ाई छोड़ने वाले छात्रों की बढ़ती संख्या पर चिंता पारंपरिक रूप से देश के कई ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में आर्थिक तंगी, सामाजिक मजबूरियों और जागरूकता की कमी के कारण बच्चों का कम उम्र में ही पढ़ाई छोड़ देना एक गंभीर समस्या बनी हुई है। जब बच्चे प्राथमिक स्तर के बाद आगे की कक्षाओं में प्रवेश नहीं लेते हैं या बीच में ही विद्यालय जाना बंद कर देते हैं, तो उनका भविष्य संकट में पड़ जाता है। इस प्रकार की योजनाओं के माध्यम से न केवल खोई हुई शैक्षणिक राह को दोबारा पाने का अवसर मिलता है, बल्कि समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े परिवारों को भी शिक्षा के महत्व के प्रति जागरूक किया जाता है। स्थानीय प्रशासन और विद्यालय प्रबंधन समितियों के सहयोग से जब जमीनी स्तर पर प्रयास किए जाते हैं, तो ड्रॉपआउट दरों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की जाती है और बच्चों के जीवन स्तर में सुधार की संभावनाएं मजबूत होती हैं।
भविष्य की कार्ययोजना और समुदाय की सहभागिता आगामी दिनों में इस अभियान को और अधिक आक्रामक और परिणाम-उन्मुख बनाने के लिए जिला प्रशासन कई अन्य महत्वपूर्ण कदम उठाने की योजना बना रहा है। इसके तहत शिक्षकों और स्वयंसेवकों के दल घर-घर जाकर अभिभावकों से संवाद स्थापित करेंगे और उन्हें बच्चों को नियमित रूप से विद्यालय भेजने के लिए प्रेरित करेंगे। इसके साथ ही, उन बच्चों के लिए विशेष ब्रिज कोर्सेज और उपचारात्मक शिक्षण की व्यवस्था करने पर भी विचार किया जा रहा है ताकि वे अन्य छात्रों के साथ आसानी से तालमेल बिठा सकें। इस पूरी प्रक्रिया में सामुदायिक सहभागिता को सबसे बड़ा आधार बनाया गया है, क्योंकि जब तक स्थानीय लोग और अभिभावक शिक्षा के इस महाअभियान से पूरी तरह नहीं जुड़ेंगे, तब तक जमीनी स्तर पर स्थायी बदलाव लाना बेहद कठिन होगा।