शिक्षा निदेशालय के बाहर छात्रों का तीखा प्रदर्शन टीजीटी और पीजीटी भर्ती प्रक्रिया के नियमों में किए गए बदलावों के खिलाफ प्रतियोगी छात्रों का आक्रोश रविवार को खुलकर सामने आ गया। अभ्यर्थियों ने शिक्षा निदेशालय के मुख्य द्वार पर पहुंचकर तीव्र विरोध प्रदर्शन किया और प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। छात्रों का साफ कहना है कि नई नियमावली के कारण उनकी चयन प्रक्रिया प्रभावित हो रही है और वे किसी भी कीमत पर पुरानी व्यवस्था को ही बहाल देखना चाहते हैं। इस अचानक हुए घेराव से प्रशासनिक अधिकारियों के बीच भी हड़कंप मच गया और सुरक्षा व्यवस्था को संभालने के लिए मौके पर भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा। प्रदर्शनकारी छात्रों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द ही सकारात्मक रुख नहीं अपनाया गया, तो आंदोलन को और अधिक तीव्र किया जाएगा।
पुरानी नियमावली की मांग और आंदोलन का दायरा इस पूरे विवाद की जड़ वह पुरानी नियमावली है जिसके तहत छात्र लंबे समय से अपनी तैयारी करते आ रहे थे। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं का तर्क है कि अचानक नियमों में बदलाव किए जाने से उन पर मानसिक और अकादमिक रूप से अतिरिक्त दबाव बढ़ गया है, जो उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ के समान है। शिक्षा विभाग के भीतर चल रहे नीतिगत बदलावों और चयन बोर्ड की कार्यप्रणाली को लेकर छात्रों में भारी निराशा और असंतोष व्याप्त है। उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए इन युवाओं का यह सामूहिक विरोध इस बात का प्रमाण है कि राज्य का युवा वर्ग अपनी रोजगार संबंधी शंकाओं को लेकर कितना गंभीर है। इसी पृष्ठभूमि में छात्रों ने अपनी आवाज को सीधे शासन के उच्च स्तर तक पहुंचाने के लिए रणनीतिक कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।
लखनऊ का रुख और आगे की प्रशासनिक रणनीति शिक्षा निदेशालय के घेराव के बाद आंदोलन के तेवर और तीखे हो गए हैं, जिसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि छात्रों का एक विशेष प्रतिनिधिमंडल और गुट अपनी मांगों का ज्ञापन लेकर सीधे लखनऊ पहुंच गया है। लखनऊ में सत्ता के गलियारों और उच्च शिक्षा अधिकारियों तक अपनी बात पहुंचाने की इस कोशिश से यह आंदोलन अब एक बड़े राज्यस्तरीय संघर्ष का रूप ले चुका है। आने वाले दिनों में यदि शासन स्तर पर कोई ठोस संवाद स्थापित नहीं हुआ, तो यह विरोध प्रदर्शन और अधिक व्यापक रूप ले सकता है, जिससे सरकार और प्रशासनिक मशीनरी पर भी दबाव बढ़ना तय है। छात्र संगठनों का यह धड़ा अडिग है कि जब तक पुरानी नियमावली को लेकर कोई स्पष्ट और लिखित आश्वासन नहीं मिलता, तब तक उनका यह संघर्ष और आंदोलन किसी भी स्थिति में थामने वाला नहीं है।