डाउ जोन्स में एक दिन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक गिरावट
अक्टूबर के महीने में अमेरिकी वित्तीय बाजार में उथल-पुथल मच गई जब 19 तारीख को निवेशकों के बीच कोहराम मच गया। अमेरिकी शेयर बाजार का प्रमुख सूचकांक डाउ जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज एक ही कारोबारी दिन के भीतर बाईस दशमलव छह प्रतिशत नीचे लुढ़क गया। प्रतिशत के हिसाब से यह आज भी इस सूचकांक के इतिहास की सबसे बड़ी एक दिवसीय गिरावट मानी जाती है। इस भारी धक्के ने वैश्विक स्तर पर वित्तीय बाजारों में खलबली पैदा कर दी और तमाम निवेशकों के मन में डर बैठ गया। एशियाई तथा यूरोपीय बाजारों में पहले से मंदी का दौर चल रहा था जिसका नकारात्मक प्रभाव अमेरिका के निवेशकों पर भी सीधा पड़ा। जिस समय यह घटना घटी उस दौरान बाजार में कारोबार की मात्रा सामान्य दिनों की तुलना में असाधारण रूप से काफी अधिक बढ़ चुकी थी। 1929 के बाद अमेरिकी शेयर बाजार में यह सबसे भयानक एक दिवसीय उथल-पुथल साबित हुई जिसने पूरी दुनिया के अर्थशास्त्रियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। बड़ी संख्या में लोग अपने शेयर बेचकर बाहर निकलना चाहते थे।
कंप्यूटर आधारित ट्रेडिंग और पोर्टफोलियो रणनीतियों का प्रभाव
इस भयानक मंदी के पीछे कई तकनीकी और कारोबारी कारण मुख्य रूप से जिम्मेदार माने गए थे। उस समय कई बड़े संस्थान ऐसी उन्नत तकनीकों और रणनीतियों का प्रयोग कर रहे थे जिनका उद्देश्य नुकसान से बचना था। कंप्यूटर आधारित ट्रेडिंग और पोर्टफोलियो इंश्योरेंस के इन तौर-तरीकों ने बाजार के दबाव को कम करने के बजाय और अधिक बढ़ा दिया। जब बड़ी संख्या में लोगों ने एक साथ अपने शेयर बेचना शुरू किया तो इन स्वचालित प्रणालियों ने गिरावट को और तेज कर दिया। शेयरों के दाम नीचे जाने पर ये प्रणालियां बिकवाली के और अधिक संकेत देने लगती थीं जिससे संकट गहराता गया। बाजार में शेयरों को बेचने वाले तो बहुत थे लेकिन उस अनुपात में उन्हें खरीदने वाले खरीदार कम पड़ गए थे। जानकारों का मानना है कि इस प्रकार बिकवाली और गिरावट का एक ऐसा चक्र तैयार हुआ जिससे स्थिति पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो गई। निवेशकों का अत्यधिक डर और तकनीकी प्रणालियों की यह व्यवस्था मिलकर इस पूरे संकट को अत्यंत गंभीर रूप देने में कामयाब रही।
केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप और बाद में लागू हुए नए नियम
इस भारी तबाही के बाद भी 1929 जैसी महामंदी जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं हो पाई क्योंकि समय रहते बड़े कदम उठा लिए गए थे। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने वित्तीय प्रणाली में पर्याप्त नकदी बनाए रखने के लिए तुरंत सक्रिय कदम उठाए। बैंकों को सामान्य रूप से ऋण देने के वास्ते प्रोत्साहित किया गया ताकि अर्थव्यवस्था पर बना दबाव जल्द से जल्द कम हो सके। इन उपायों का असर यह हुआ कि बाजार ने बहुत तेजी से सुधार दिखाना शुरू कर दिया और हालात सुधरने लगे। इस मंदी के केवल दो सत्रों के भीतर डाउ जोन्स ने अपनी शुरुआती बड़ी गिरावट का एक बड़ा हिस्सा फिर से वापस पा लिया था। दो वर्ष से भी कम समय के भीतर अमेरिकी बाजार अपने पुराने उच्च स्तर को पार करते हुए आगे निकल गया। इस गंभीर अनुभव के बाद नियामकों ने जोखिम प्रबंधन की समीक्षा की और वर्ष 1988 में सर्किट ब्रेकर की व्यवस्था लागू की। इस नई प्रणाली का उद्देश्य भविष्य में अत्यधिक गिरावट के वक्त कारोबार को अस्थायी रूप से रोककर सभी को संभलने का मौका देना था।