साइलेंट किलर बीमारी की पहचान
हड्डियों की मजबूती घटने की समस्या जिसे चिकित्सकीय भाषा में ऑस्टियोपोरोसिस कहा जाता है, मुख्य रूप से बढ़ती आयु का परिणाम होती है। इस स्थिति में शरीर के भीतर हड्डियों का ढांचा खोखला हो जाता है और वे अपनी संरचनात्मक शक्ति खोने लगती हैं। इसे 'साइलेंट किलर' के रूप में इसलिए जाना जाता है क्योंकि शुरुआत में इसका कोई स्पष्ट दर्द या बाहरी संकेत दिखाई नहीं देता। आमतौर पर व्यक्ति को अपनी बीमारी का पता तब चलता है जब वह किसी मामूली धक्के या गिरने की घटना के बाद किसी हड्डी के फ्रैक्चर का सामना करता है। रीढ़ की हड्डी पर दबाव बढ़ने से शरीर का कद कम होना या पीठ का आगे की तरफ झुक जाना भी इसके महत्वपूर्ण लक्षण माने जाते हैं। विशेष रूप से 50 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में इसका खतरा सबसे ज्यादा रहता है। महिलाओं में मेनोपॉज के बाद एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी हड्डियों के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, जिसके कारण करीब 80 फीसद महिलाएं इस बीमारी से ग्रसित हो जाती हैं।
जांच के साधन और चिकित्सा सुविधाएं
हड्डियों की सघनता मापने के लिए बोन मिनरल डेंसिटी (बीएमडी) टेस्ट या डेक्सा स्कैन नामक विशेष एक्स-रे तकनीक का उपयोग किया जाता है। राज्य के अधिकांश प्रमुख संस्थानों जैसे लखनऊ के संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट, किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी और डॉ। राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में ये मशीनें रियायती दरों पर उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त एम्स गोरखपुर, एम्स रायबरेली और बीएचयू वाराणसी के सर सुंदरलाल अस्पताल में भी ये सुविधाएं मौजूद हैं। निजी प्रयोगशालाओं में इन जांचों का शुल्क 1500 से 2500 रुपये तक हो सकता है। जिला चिकित्सालयों में विटामिन डी3 की मात्रा मापने वाली जांच के जरिए भी हड्डियों की स्थिति का आकलन किया जाता है। स्वास्थ्य महानिदेशक पवन कुमार अरुण के अनुसार, यह जांच हड्डियों में कैल्शियम सोखने की प्रक्रिया और पोषक तत्वों की मौजूदगी की जानकारी देती है। वर्तमान में जिला स्तरीय अस्पतालों में बीएमडी जैसी अत्याधुनिक जांच सुविधाओं की उपलब्धता मेडिकल कॉलेजों की तुलना में काफी सीमित है।
आयु वर्ग और जोखिम के कारक
उत्तर भारत के शोध आंकड़ों के मुताबिक, 35 से 40 वर्ष की आयु के बाद हड्डियों का घनत्व कम होना शुरू हो जाता है। शहरी परिवेश की तुलना में ग्रामीण इलाकों के उन निवासियों में यह समस्या अधिक देखी जाती है जो खराब खानपान और शारीरिक मेहनत की कमी या फिर बहुत ज्यादा श्रम वाली जीवनशैली अपनाते हैं। केजीएमयू और बलरामपुर अस्पताल की ओपीडी रिपोर्ट संकेत देती है कि जोड़ दर्द से जूझने वाले मरीजों में महिलाओं का प्रतिशत 65 से 70 के बीच रहता है। विशेष परिस्थितियों में, जैसे कि गर्भावस्था के दौरान ऑस्टियोपोरोसिस होने पर महिलाओं को अस्पताल में अधिक निगरानी यानी हाई डिपेंडेंसी यूनिट में रखने की जरूरत पड़ती है। विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि विटामिन डी की कमी के अलावा हार्मोनल असंतुलन, किडनी की समस्याएं, निष्क्रिय दिनचर्या और धूम्रपान जैसे कारक भी हड्डियों को नुकसान पहुँचा सकते हैं। किसी भी व्यक्ति को पीठ दर्द या शारीरिक मुद्रा में बदलाव जैसे संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और समय रहते डॉक्टरी सलाह के बाद जरूरी जांच करानी चाहिए।