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पोषक तत्वों की खोज: राष्ट्रीय पोषण संस्थान कर रहा है उत्तराखंड की पारंपरिक पहाड़ी थाली पर शोध
उत्तराखंड के पारंपरिक खान-पान और पहाड़ी व्यंजनों के औषधीय और पौष्टिक गुणों को सामने लाने के लिए राष्ट्रीय पोषण संस्थान ने एक महत्वपूर्ण शोध कार्य शुरू किया है, जिससे स्थानीय भोजन का नया पोषण सूत्र तैयार होगा।
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Ankit Yadav
04 सित 2026, 16:42
देश भर में अपने प्राकृतिक सौंदर्य और समृद्ध संस्कृति के लिए मशहूर उत्तराखंड अब अपने पारंपरिक व्यंजनों के अनूठे स्वास्थ्य लाभों को लेकर भी एक बार फिर सुर्खियों में है। पर्वतीय क्षेत्रों की पारंपरिक थाली में शामिल होने वाले व्यंजनों में प्रकृति ने कई ऐसे पोषक तत्व और औषधीय गुण समाहित किए हैं, जिनके बारे में आधुनिक विज्ञान अब गहराई से अध्ययन कर रहा है। इसी सिलसिले में राष्ट्रीय पोषण संस्थान (एनआईएन) की एक विशेष शोध टीम ने उत्तराखंड की पारंपरिक पहाड़ी थाली पर वैज्ञानिक अनुसंधान शुरू कर दिया है ताकि इसमें मौजूद विटामिन्स, मिनरल्स और अन्य जैविक तत्वों का सटीक आकलन किया जा सके।
पारंपरिक खान-पान और स्वास्थ्य
उत्तराखंड का पारंपरिक भोजन हमेशा से ही मौसम के अनुकूल और अत्यधिक पौष्टिक माना जाता रहा है। यहाँ के स्थानीय अनाजों, दालों, जंगली सब्जियों और मसालों का इस्तेमाल पीढ़ियों से लोग अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने के लिए करते आए हैं। आधुनिक समय की जीवनशैली और खान-पान में बदलाव के बीच, यह शोध इस बात का वैज्ञानिक प्रमाण जुटाने का प्रयास कर रहा है कि हमारे पूर्वजों की भोजन शैली किस प्रकार आज की स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने में मददगार साबित हो सकती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि पहाड़ी थाली में मिलने वाले घटक शारीरिक ऊर्जा बढ़ाने और कुपोषण जैसी समस्याओं से लड़ने में अत्यंत प्रभावी हो सकते हैं।
इस व्यापक अनुसंधान के दौरान संस्थान के विशेषज्ञ उत्तराखंड के विभिन्न पहाड़ी जिलों से पारंपरिक व्यंजनों के नमूनों का प्रयोगशाला में परीक्षण कर रहे हैं। इसमें मंडुआ, झंगोरा, गहत, भट्ट और स्थानीय साग-सब्जियों जैसी पारंपरिक खाद्य सामग्रियों की पोषण गुणवत्ता की बारीकी से जांच की जा रही है। वैज्ञानिक यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि पारंपरिक खाना पकाने की विधियों से इन खाद्य पदार्थों के पोषक तत्व किस प्रकार सुरक्षित रहते हैं और मानव शरीर पर उनका क्या सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस अध्ययन से मिलने वाले परिणाम न केवल क्षेत्रीय खान-पान को बढ़ावा देंगे, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर पोषण नीतियों को तय करने में भी बेहद उपयोगी साबित होंगे।
अनुसंधान के सकारात्मक परिणामों की उम्मीद के साथ ही यह माना जा रहा है कि आने वाले समय में उत्तराखंड के इन पारंपरिक व्यंजनों को वैश्विक पटल पर एक सुपरफूड के रूप में पहचान मिल सकती है। जानकारों का कहना है कि जब वैज्ञानिक मुहर लग जाएगी, तो देश-दुनिया के लोग पहाड़ी थाली के स्वास्थ्य लाभों के प्रति और अधिक जागरूक होंगे। इससे न केवल स्थानीय किसानों और उत्पादकों को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि ग्रामीण आर्थिकी को भी मजबूती मिलेगी। शोध पूरा होने के बाद राष्ट्रीय पोषण संस्थान अपनी विस्तृत रिपोर्ट सार्वजनिक करेगा, जिससे पारंपरिक भारतीय आहार विज्ञान को एक नई दिशा मिलने की पूरी उम्मीद जताई जा रही है।