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खुली गिरफ्तारी का आरोप: सीआरपीएफ कमांडेंट ने राष्ट्रपति से की डीआईजी विजिलेंस की शिकायत

देश के सुरक्षा बलों से जुड़ा एक बड़ा प्रशासनिक और आंतरिक विवाद सामने आया है, जहाँ एक सीआरपीएफ कमांडेंट को उनके मूल स्थान से तीन हजार किलोमीटर दूर अटैच किए जाने के बाद गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

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Ankit Yadav
09 सित 2026, 12:56
खुली गिरफ्तारी का आरोप: सीआरपीएफ कमांडेंट ने राष्ट्रपति से की डीआईजी विजिलेंस की शिकायत
केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के भीतर चल रहे प्रशासनिक विवादों ने तूल पकड़ लिया है। एक कमांडेंट स्तर के अधिकारी को उनके कार्यक्षेत्र से लगभग तीन हजार किलोमीटर दूर अटैच किए जाने के मामले ने नया मोड़ ले लिया है। इस कार्रवाई से नाराज अधिकारी ने इसे एक प्रकार की खुली गिरफ्तारी करार दिया है और इस संबंध में सीधे देश के राष्ट्रपति को औपचारिक शिकायत भेजी है। अधिकारी का दावा है कि इस पूरी प्रक्रिया में प्रशासनिक नियमों और आंतरिक पारदर्शिता की अनदेखी की गई है, जिसके चलते उन्हें मानसिक और पेशेवर रूप से भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

डीआईजी विजिलेंस पर गंभीर सवाल

अधिकारियों और प्रशासनिक अमले के बीच चल रही यह खींचतान अब देश के सर्वोच्च कार्यालय तक पहुँच चुकी है। प्रेषित शिकायत में विशेष रूप से डीआईजी विजिलेंस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। कमांडेंट का आरोप है कि उन्हें बिना किसी ठोस और न्यायसंगत कारण के इतनी लंबी दूरी पर स्थानांतरित या अटैच किया गया है, जो कि उनके अधिकारों का हनन है। सुरक्षा बलों जैसे अनुशासित संगठन में इस तरह के आंतरिक मतभेद और उच्चाधिकारियों पर सीधे भ्रष्टाचार या मनमानी के आरोप लगना एक बेहद संवेदनशील विषय बन जाता है। इस मामले के सामने आने के बाद से ही सुरक्षा बलों के भीतर हलचल तेज हो गई है और विभिन्न स्तरों पर इसकी आंतरिक समीक्षा की मांग उठने लगी है। इस प्रकार के मामलों में आमतौर पर यह देखा जाता है कि जब आंतरिक शिकायत निवारण तंत्र से अधिकारियों का भरोसा डगमगाता है, तब वे न्याय की आस में सीधे सर्वोच्च संवैधानिक पदों का दरवाजा खटखटाते हैं। राष्ट्रपति को भेजी गई इस शिकायत में पूरे घटनाक्रम का सिलसिलेवार ब्योरा दिया गया है, जिसमें यह भी बताया गया है कि किस प्रकार एक प्रशासनिक आदेश ने उनके दैनिक और पेशेवर जीवन को प्रभावित किया है। कमांडेंट ने मांग की है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और विजिलेंस विंग द्वारा की गई कार्रवाई की समीक्षा हो ताकि संगठन के भीतर पारदर्शिता और न्याय बहाल किया जा सके। सुरक्षा बलों के जानकारों का मानना है कि इस तरह के सार्वजनिक विवाद न केवल संगठन की छवि को प्रभावित करते हैं, बल्कि आंतरिक मोर्चे पर भी काम करने वाले अधिकारियों का मनोबल गिराते हैं। बल के भीतर अनुशासन सर्वोपरि माना जाता है, लेकिन जब बात व्यक्तिगत अधिकारों और उत्पीड़न की आती है, तो अधिकारी कानूनी और संवैधानिक उपायों का सहारा लेने से पीछे नहीं हटते। राष्ट्रपति भवन को दी गई इस शिकायत के बाद अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि संबंधित मंत्रालय या सीआरपीएफ मुख्यालय इस पर क्या प्रतिक्रिया देता है और क्या डीआईजी विजिलेंस के खिलाफ कोई आंतरिक जांच बिठाई जाती है या नहीं। आगामी दिनों में इस प्रकरण के तूल पकड़ने की पूरी संभावना है क्योंकि देश के प्रमुख सुरक्षा बलों में इस स्तर के प्रशासनिक विवाद बहुत कम ही सार्वजनिक होते हैं। पीड़ित कमांडेंट द्वारा उठाए गए कदमों से यह संदेश भी गया है कि सुरक्षा बलों के भीतर भी अब अधिकारी अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक हो चुके हैं और मनमाने फैसलों के खिलाफ आवाज उठाने लगे हैं। इस पूरी घटना ने एक बार फिर से यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या सुरक्षा बलों के प्रशासनिक ढांचे में सुधार और आंतरिक निगरानी तंत्र को और अधिक पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में इस तरह की अप्रिय स्थितियों से बचा जा सके।
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