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महिलाओं की भागीदारी: खान-पान के कारोबार में बिहार राष्ट्रीय औसत को पछाड़ देश में दूसरे स्थान पर

बिहार में रसोई संभालने वाली महिलाएं अब खान-पान के कारोबार के जरिये अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं। राज्य में इस क्षेत्र के कुल कामगारों में बावन प्रतिशत महिलाएं हैं, जो राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है।

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Ankit Yadav
26 अक्ट 2026, 10:26
महिलाओं की भागीदारी: खान-पान के कारोबार में बिहार राष्ट्रीय औसत को पछाड़ देश में दूसरे स्थान पर

खान-पान के कारोबार में महिलाओं की मजबूत स्थिति

खान-पान और खान-पान से जुड़े व्यवसायों के माध्यम से महिलाएं अपनी आमदनी को लगातार बढ़ा रही हैं और घर चलाने में बड़ी सहायता कर रही हैं। बिहार इस मामले में पूरे देश में दूसरे स्थान पर अपनी जगह बना चुका है। राज्य के इस सेक्टर में कार्यरत कुल कामगारों में बावन प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं, जबकि पूरे भारत में महिलाओं की औसत भागीदारी इकतालीस प्रतिशत ही दर्ज की गई है। असंगठित क्षेत्र से जुड़े कामगारों का पंजीकरण वर्ष दो हजार इक्कीस से ई-श्रम पोर्टल पर लगातार किया जा रहा है। इस पोर्टल पर फूड सेक्टर से जुड़े अठारह लाख साठ हजार से अधिक कामगारों ने अपना पंजीकरण कराया है। इन सभी पंजीकृत लोगों में उत्तर प्रदेश राज्य में सबसे अधिक तीन लाख ब्यासी हजार कामगार शामिल हैं। वहीं दूसरी ओर, बिहार राज्य के भीतर एक लाख नब्बे हजार कामगारों ने इस पोर्टल पर अपना पंजीकरण पूरा कराया है। राज्य के इस क्षेत्र में युवा वर्ग के लोग सबसे अधिक संख्या में काम कर रहे हैं। इस व्यवसाय से जुड़े कुल कामगारों में उनहत्तर प्रतिशत लोग अठारह से चालीस वर्ष की आयु वर्ग के अंतर्गत आते हैं। चालीस से पचास वर्ष की आयु के कामगारों की हिस्सेदारी इस क्षेत्र में अठारह प्रतिशत तक है। पचास वर्ष से अधिक उम्र के लोग भी इस कार्य के जरिए अपनी आजीविका का साधन चला रहे हैं। उनकी कुल हिस्सेदारी इस व्यवसाय में बारह प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई है।

रोजगार के विभिन्न साधन और युवाओं की बड़ी संख्या

राज्यभर में स्ट्रीट फूड का काम रोजगार का एक बहुत बड़ा जरिया बनकर सामने आया है। बिहार के इस रोजगार क्षेत्र में ठेला, खोमचा, ढाबा, चाट और पकौड़ा जैसे खान-पान के व्यवसाय की सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। इस विशिष्ट क्षेत्र में चार लाख छत्तीस हजार से अधिक लोग पूरी मेहनत से काम कर रहे हैं। इसके अलावा बेकरी उद्योग में लगभग चालीस हजार लोग अपनी सेवाएं दे रहे हैं। फूड ग्रेन और मिलिंग से जुड़े कार्यों में सोलह हजार लोग और होम डिलिवरी के क्षेत्र में पंद्रह हजार लोग कार्यरत हैं। दूध बेचने के कार्य और चाय बनाने के काम में भी दस-दस हजार से अधिक लोग अपनी आजीविका चला रहे हैं। खाना पकाने के कार्य में लगभग दस हजार और ठेले पर फल बेचने के कारोबार में छह हजार पांच सौ से अधिक लोग काम कर रहे हैं। यह सभी व्यवसाय महिलाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार प्राप्त करने का एक अत्यंत महत्वपूर्ण माध्यम साबित हो रहे हैं। बहुत ही कम पूंजी के निवेश से शुरू होने वाले इन सभी व्यवसायों के माध्यम से महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं। इसके साथ ही वे अपने परिवार की कुल आय में भी बहुत अच्छा योगदान दे रही हैं।

संघर्ष और सफलता की प्रेरणादायक कहानियां

राजधानी पटना के महेंद्रू इलाके में चाय की एक छोटी-सी दुकान चलाने वाली प्रीति झा आज सोशल मीडिया पर नर्सिंग चायवाली के रूप में लोकप्रिय हैं। उनकी पहचान अब सिर्फ चाय बेचने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे उनका कड़ा संघर्ष और बेटी के भविष्य का जुनून है। प्रीति ने नर्सिंग की पढ़ाई पूरी की थी और उनकी शादी भी हुई थी, लेकिन पति की शराब की लत के कारण उन्हें अलग होने का कड़ा फैसला लेना पड़ा। अपनी छोटी बेटी की जिम्मेदारी उठाने के लिए उन्होंने खुद ही चाय का स्टॉल शुरू किया और आज वह हर महीने तीस हजार रुपये तक कमा लेती हैं। पटना के एसके पुरी पार्क के पास स्टॉल चलाने वाली दो बहनों का कुचु-पुचु नाम का काउंटर युवाओं के बीच बहुत प्रसिद्ध है। एक बहन शादीशुदा है, जबकि दूसरी बहन मां की खराब तबीयत के कारण अपनी कॉरपोरेट नौकरी छोड़कर पटना वापस आ गई थी। राशिका वरुण तिवारी और सपना तिवारी नामक दोनों बहनों ने मिलकर यह स्टॉल लगाने का निर्णय लिया था। सड़क के किनारे दुकान के लिए जगह की व्यवस्था करने से लेकर घर संभालने तक उन्हें भारी संघर्ष करना पड़ा। सपना का यह कहना है कि अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़कर खुद का काम शुरू करना कभी भी आसान नहीं होता है।

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