कर्मचारियों की भारी कमी से जूझता अस्पताल अयोध्या जिले के अंतर्गत आने वाले इस आयुर्वेदिक चिकित्सा संस्थान में प्रशासनिक व्यवस्था और चिकित्सीय कार्य पूरी तरह चरमरा गए हैं। स्थिति यह है कि पूरे संस्थान की जिम्मेदारी केवल चार कर्मियों के भरोसे छोड़ दी गई है। इतनी कम संख्या में स्टाफ होने के कारण ओपीडी से लेकर दवा वितरण और अन्य चिकित्सीय औपचारिकताएं पूरी करने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। अस्पताल आने वाले सामान्य मरीजों को भी अपनी बारी के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है और कई बार बिना समुचित उपचार के ही वापस लौटना पड़ता है। स्थानीय नागरिकों और तीमारदारों का कहना है कि जब अस्पताल में डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ ही मौजूद नहीं होंगे, तो बीमार लोगों को स्वास्थ्य लाभ कैसे मिल पाएगा। इस गंभीर असंतुलन के कारण चिकित्सालय के भीतर की व्यवस्थाएं बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं और परिसर में हमेशा एक प्रकार की अव्यवस्था का माहौल बना रहता है।
ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं पर मंडराता गंभीर संकट भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा देने के दावे तो बड़े स्तर पर किए जाते हैं, परंतु धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत नजर आती है। सरकारी स्तर पर संचालित होने वाले इन अस्पतालों का मुख्य उद्देश्य दूरदराज के इलाकों और जरूरतमंदों तक सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना होता है। हालांकि, जब प्रशासनिक लापरवाही या रिक्त पदों के लंबे समय तक न भरे जाने के कारण केंद्रों पर गिनती के लोग ही तैनात रहते हैं, तो पूरी योजना कागजी साबित होने लगती है। इस प्रकार की समस्याओं से न केवल संबंधित संस्थान की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा भी कमजोर पड़ता है। इस प्रकार के केंद्रों में डॉक्टरों, फार्मासिस्टों और अन्य आवश्यक कर्मियों के पद खाली पड़े रहना आम बात हो चली है, जिससे जनता का सरकारी चिकित्सा व्यवस्था से धीरे-धीरे मोहभंग होने लगता है। प्रशासनिक उदासीनता के चलते ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के आयुर्वेद केंद्रों की यह दयनीय हालत विभागीय कार्यशैली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है।
सुधार की उम्मीद और प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग इस लचर व्यवस्था के सार्वजनिक होने के बाद अब यह उम्मीद जताई जा रही है कि उच्चाधिकारी इस मामले का संज्ञान लेंगे और जल्द ही कोई ठोस कदम उठाया जाएगा। क्षेत्रीय जनता और जागरूक नागरिकों ने स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों से मांग की है कि इस अस्पताल में तुरंत प्रभाव से डॉक्टरों और अन्य जरूरी कर्मचारियों की नियुक्ति की जाए। यदि समय रहते रिक्त पदों को नहीं भरा गया, तो आने वाले दिनों में स्थिति और अधिक विकट हो सकती है, जिससे मरीजों की जान जोखिम में पड़ सकती है। इस दिशा में स्थानीय प्रशासन और चिकित्सा निदेशालय को मिलकर एक व्यापक कार्ययोजना तैयार करनी चाहिए ताकि पारंपरिक चिकित्सालयों की दशा सुधारी जा सके। जनता की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि शासन स्तर से इस दिशा में कब और क्या सकारात्मक कार्रवाई की जाती है जिससे इस चिकित्सा केंद्र को सुचारू रूप से चलाया जा सके।