राजधानी लखनऊ में स्वास्थ्य योजनाओं के क्रियान्वयन की पोल खोलती हुई एक बेहद गंभीर खबर सामने आई है, जिसके तहत जिले के लगभग बाईस हजार टीबी (क्षय रोग) रोगियों को पिछले सोलह महीनों से लगातार पोषण राशि के रूप में मिलने वाली वित्तीय सहायता नहीं मिल पाई है। मरीजों के खातों में यह जरूरी सहायता राशि लंबे समय से नहीं पहुंचने के कारण उनके खानपान और इलाज की प्रक्रिया पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत मरीजों को पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने के लिए यह वित्तीय मदद दी जानी थी, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती और विभागीय लेट-लतीफी की वजह से यह सहायता राशि बीच में ही अटक कर रह गई है, जिससे जरूरतमंद मरीज लगातार परेशान हो रहे हैं।
इस पूरी समस्या के पीछे मुख्य रूप से प्रशासनिक फेरबदल, बजट के आवंटन में देरी और तकनीकी तथा पोर्टल संबंधी बाधाओं को जिम्मेदार माना जा रहा है, जिनकी वजह से समय पर सत्यापन और भुगतान की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई। सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुसार टीबी के प्रत्येक मरीज को बीमारी के दौरान पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए नियमित रूप से हर महीने एक निश्चित आर्थिक सहायता दी जाती है ताकि वे बेहतर आहार ले सकें और उनकी रिकवरी तेजी से हो सके। हालांकि, जमीनी स्तर पर समन्वय की भारी कमी और अधिकारियों की उदासीनता के चलते यह कल्याणकारी योजना कागजों तक ही सीमित होकर रह गई है, जबकि जरूरतमंद मरीज अस्पताल और कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर हैं लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है।
इस ताजा खुलासे के बाद स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन पर सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं तथा इस बात की मांग की जा रही है कि तुरंत प्रभाव से सभी लंबित मामलों की समीक्षा कर बकाया राशि का भुगतान सीधे मरीजों के बैंक खातों में सुनिश्चित किया जाए। यदि इस मामले में जल्द ही कोई ठोस और सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया, तो यह लापरवाही हजारों गरीब और कमजोर वर्ग के मरीजों के जीवन के लिए बड़ा खतरा बन सकती है, क्योंकि टीबी जैसी गंभीर बीमारी के दौरान पोषण की कमी से मरीजों की सेहत में सुधार होने के बजाय उनकी स्थिति और अधिक बिगड़ सकती है। स्थानीय स्तर पर इस बात को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में मरीजों के साथ इस तरह की वित्तीय अनदेखी कैसे लंबे समय तक छिपी रही और इसकी उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए।