कनाडा में छह साल और डेलॉइट की नौकरी का सफर विदेश में करियर की ऊंचाइयों को छूना हर युवा का सपना होता है और इस महिला ने भी अपनी मेहनत के दम पर कनाडा की धरती पर एक मुकाम हासिल किया था। वहां रहते हुए उसने करीब छह साल तक बहुराष्ट्रीय कंपनी डेलॉइट में काम किया जहां उसे आकर्षक लाखों का पैकेज मिलता था। पेशेवर मोर्चे पर उसका जीवन बेहद स्थिर और आरामदायक था क्योंकि उसके पास बेहतरीन सुविधाएं और भविष्य की मजबूत योजना थी। इसके बावजूद उसके भीतर लगातार अपनी मातृभूमि लौटने की तीव्र इच्छा सुलग रही थी जो विदेशी चमक-धमक और भौतिक सुख-सुविधाओं से कहीं अधिक भारी पड़ रही थी। अंततः उसने कॉरपोरेट दुनिया की इस सुनहरी बेड़ी को तोड़ने का फैसला किया और अपनी इस उच्च पद वाली नौकरी को अलविदा कह दिया। उसके इस कदम ने सोशल मीडिया और पेशेवर हलकों में खासी चर्चा बटोरी है क्योंकि इतनी मोटी सैलरी और विदेश में स्थायी निवास जैसी संभावनाओं को छोड़ना आम बात नहीं है। यह घटना दर्शाती है कि कई बार आंतरिक संतोष और अपनों का साथ भौतिक संपदा और विदेशी मुद्रा से कहीं ज्यादा मूल्यवान साबित होता है।
मातृभूमि का आकर्षण और विदेश में प्रवासियों की दुविधा आधुनिक दौर में बेहतर भविष्य की तलाश में लाखों भारतीय हर साल पश्चिमी देशों का रुख करते हैं जहां उन्हें भारी भरकम वेतन और उन्नत जीवन स्तर का लालच खींचता है। हालांकि जब कोई पेशेवर व्यक्ति विदेश में छह साल जैसे लंबे समय तक टिक जाता है और डेलॉइट जैसी दिग्गज कंपनी में स्थापित हो जाता है तो उसका वापस लौटना एक बड़ा बदलाव माना जाता है। इस प्रकार के निर्णय के पीछे अक्सर सांस्कृतिक अलगाव अपने देश के सामाजिक ताने-बाने की कमी और बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल जैसी गहरी भावनात्मक वजहें जुड़ी होती हैं। विदेश की चकाचौंध भले ही पहली नजर में बहुत आकर्षक लगे लेकिन वहां की अकेली और यंत्रवत जिंदगी कई बार इंसानी संवेदनाओं पर भारी पड़ने लगती है। भारत लौटने की यह जिद केवल एक नौकरी छोड़ने का मामला नहीं है बल्कि यह उस मानसिक द्वंद्व का परिणाम है जो हर उस प्रवासी के मन में चलता रहता है जो अपनी जड़ों से दूर रहता है। इस तरह के मामलों में जब लोग अपनी आरामदायक जिंदगी को दांव पर लगाकर वापस आते हैं तो यह समाज के लिए भी एक सोचने योग्य विषय बन जाता है कि विकास की अंधी दौड़ में हम अपनी प्राथमिकताओं को किस दिशा में ले जा रहे हैं।
स्वदेश वापसी पर भविष्य की नई राहें और प्रतिक्रियाएं लाखों के पैकेज वाली कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर भारत लौटने के इस साहसिक निर्णय पर सोशल मीडिया से लेकर व्यावसायिक जगत तक में विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे आर्थिक दृष्टिकोण से एक मूर्खतापूर्ण फैसला मान रहे हैं क्योंकि इतनी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी की नौकरी और विदेशी करियर को छोड़ना आसान नहीं होता है। वहीं दूसरी ओर एक बड़ा वर्ग इस महिला के इस जज्बे की सराहना कर रहा है जो भौतिक सफलता के बजाय अपनों के बीच रहकर काम करने को प्राथमिकता दे रही है। भारत में आज के समय में स्टार्टअप संस्कृति और कॉर्पोरेट सेक्टर का तेजी से विस्तार हो रहा है जिसके कारण वापस लौटने वाले पेशेवरों के लिए यहां भी अवसरों की कोई कमी नहीं है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि वह अपने इस लंबे विदेशी अनुभव और कौशल का उपयोग भारतीय बाजार में किस प्रकार करती है और अपने करियर को नया आयाम देती है। इस प्रकार के उदाहरण आने वाले दिनों में अन्य युवाओं को भी अपनी मिट्टी से जुड़ने और बड़े फैसलों से न डरने की प्रेरणा दे सकते हैं जिससे देश के भीतर ही प्रतिभाओं का लाभ मिलने की संभावना बढ़ जाती है।