अस्पताल में एक्स-रे सेवाएं ठप होने से मरीजों की बढ़ी मुश्किलें अयोध्या मेडिकल कॉलेज परिसर में उस समय अफरा-तफरी का माहौल बन गया जब अचानक एक्स-रे की सुविधा पूरी तरह बंद हो गई। स्थिति को और गंभीर बनाते हुए बिजली की अनुपस्थिति और मशीन के तकनीकी रूप से खराब हो जाने की दोहरी मार मरीजों पर पड़ी। पचास किलोमीटर से भी अधिक की लंबी और थका देने वाली दूरी तय करके अपना इलाज कराने आए बीमार लोग घंटों तक अस्पताल के परिसरों में बिना किसी सहारे के बैठे रहे। इस तकनीकी व्यवधान के कारण हड्डी और फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियों के मामलों में डॉक्टरों द्वारा तुरंत जांच लिखकर दिए जाने के बावजूद मरीज अपनी बारी का घंटों इंतजार करते रहे लेकिन उन्हें मायूसी ही हाथ लगी। अस्पताल प्रशासन की ओर से इस अचानक आई तकनीकी बाधा को दूर करने के लिए शुरुआती घंटों में कोई त्वरित वैकल्पिक व्यवस्था नजर नहीं आई, जिससे आम जनता का गुस्सा और परेशानी दोनों ही लगातार बढ़ती चली गई। अस्पताल आने वाले गरीब तबके के लोगों के पास महंगे निजी डायग्नोस्टिक केंद्रों पर जाकर अपनी जांच करवाने के लिए पर्याप्त धन नहीं होता है, जिस कारण उन्हें सरकारी संस्थान के इस नाकारापन की कीमत अपनी शारीरिक पीड़ा को सहकर चुकानी पड़ रही है और वार्डों के बाहर लंबी कतारों में खड़े असहाय लोग लगातार अपनी बदहाली पर आंसू बहाने को मजबूर दिखाई दे रहे हैं।
स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे की बदहाली और प्रशासनिक उदासीनता का असर देशभर के सरकारी चिकित्सा संस्थानों में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, परंतु जमीनी हकीकत इन दावों के बिल्कुल विपरीत नजर आती है। अयोध्या जैसे महत्वपूर्ण और व्यस्त क्षेत्रीय केंद्र में स्थित मेडिकल कॉलेज में यदि इस प्रकार की बुनियादी चिकित्सा सुविधाएं ठप पड़ जाती हैं, तो यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। एक तरफ जहां बिजली आपूर्ति लगातार बाधित होना प्रशासनिक कुप्रबंधन को दर्शाता है, वहीं दूसरी तरफ अत्याधुनिक कही जाने वाली मशीनों का समय पर रखरखाव न होना तकनीकी अमले की बड़ी लापरवाही को उजागर करता है। मेडिकल कॉलेज जैसे बड़े संस्थानों में करोड़ों रुपए के बजट आधुनिक उपकरणों की खरीद और उनके रखरखाव के लिए आवंटित किए जाते हैं, बावजूद इसके यदि मामूली तकनीकी खराबी या पावर कट के कारण मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़े तो यह व्यवस्था की संवेदनहीनता को स्पष्ट करता है। इस तरह के अस्पतालों पर पचास किलोमीटर से भी ज्यादा के दायरे में फैले ग्रामीण इलाकों के लाखों लोग अपनी हर छोटी-बड़ी बीमारी के इलाज के लिए पूरी तरह से निर्भर रहते हैं, लेकिन जब उन्हें यहां पहुंचकर केवल निराशा और दुर्व्यवस्था मिलती है तो सरकारी चिकित्सा व्यवस्था से आम आदमी का भरोसा धीरे-धीरे पूरी तरह से उठने लगता है और उन्हें मजबूरन प्राइवेट अस्पतालों की ओर रुख करना पड़ता है।
मरीजों का बढ़ता रोष और वैकल्पिक व्यवस्थाओं की सख्त जरूरत इस प्रकार की गंभीर लापरवाही और कुव्यवस्था के कारण स्थानीय जनता तथा इलाज के लिए आने वाले पीड़ितों के तीखे तेवर आने वाले दिनों में और अधिक उग्र हो सकते हैं। यदि समय रहते अस्पताल प्रबंधन ने एक्स-रे मशीनों को दुरुस्त कर सुचारू बिजली बैकअप का स्थायी समाधान नहीं निकाला, तो यह मुद्दा बड़े जन आंदोलन या राजनीतिक तूल का कारण बन सकता है। मरीजों और उनके तीमारदारों का कहना है कि जब तक सरकारी अस्पतालों में जवाबदेही तय नहीं की जाएगी, तब तक ऐसी समस्याओं से निजात मिलना असंभव है। आने वाले समय में स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों को इस पूरे प्रकरण का कड़ा संज्ञान लेते हुए दोषी कर्मचारियों और तकनीकी सलाहकारों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की अमानवीय लापरवाही की पुनरावृत्ति न हो सके। इसके अलावा आपातकालीन सेवाओं और डायग्नोस्टिक विभागों को निर्बाध रूप से चलाने के लिए सोलर पावर या हाई-कैपेसिटी जनरेटर जैसी वैकल्पिक व्यवस्थाओं को प्राथमिकता के आधार पर स्थापित किया जाना अत्यंत आवश्यक हो गया है, जिससे दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से आने वाले गरीब मरीजों को इस भीषण गर्मी और दर्द के बीच बिना इलाज के लौटने की त्रासदी का सामना दोबारा न करना पड़े।