जलस्तर घटने के बाद भी बाराबंकी में भीषण कटान उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले से एक गंभीर संकट की खबर सामने आ रही है जहाँ प्रमुख नदियों के तेवर अभी भी नरम नहीं पड़े हैं। प्रादेशिक स्तर पर जलस्तर में कुछ सुधार और पानी कम होने के आंकड़े सामने आ रहे हैं, परंतु धरातल की वास्तविकता बिल्कुल अलग और भयावह बनी हुई है। नदियों की धाराओं का रुख अभी भी तटों को तेजी से काटने की दिशा में ही बना हुआ है जिसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों में भय का माहौल व्याप्त है। इसी विनाशकारी प्रक्रिया के दौरान पानी के बहाव और मिट्टी के कटाव के कारण एक स्थानीय धार्मिक स्थल यानी मस्जिद भी सीधे तौर पर इस विनाश की चपेट में आ गई है। प्रशासन और स्थानीय निवासियों के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक बनती जा रही है क्योंकि पानी घटने के बावजूद जमीन का धंसना और नदी में समा जाना जारी है।
नदियों के कटाव की भौगोलिक पृष्ठभूमि और खतरे उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में बहने वाली घाघरा और सरयू जैसी नदियां अपने मार्ग परिवर्तन और तीव्र कटाव के लिए कुख्यात रही हैं। मानसूनी सीजन के उतार-चढ़ाव के दौरान जब इन जलधाराओं का स्तर ऊपर-नीचे होता है, तब तटवर्ती इलाकों की कमजोर मिट्टी पानी के दबाव को झेल नहीं पाती है। जलस्तर में कमी आने के बाद भी पानी का वेग और भंवर तटों के नीचे की उपजाऊ और रेतीली जमीन को अंदर ही अंदर काटते रहते हैं, जिससे अचानक बड़े हिस्से नदी में ढह जाते हैं। बाराबंकी क्षेत्र में इस प्रकार की घटनाएं पहले भी स्थानीय आबादी और कृषि भूमि के लिए भारी नुकसान का कारण बनती रही हैं। इस तरह के भौगोलिक संकटों से निपटने के लिए आमतौर पर सिंचाई विभाग और जिला प्रशासन द्वारा समय-समय पर ठोकर निर्माण और तटबंध मजबूती के कार्य किए जाते हैं, ताकि रिहायशी बस्तियों और महत्वपूर्ण संरचनाओं को सुरक्षित रखा जा सके।
प्रशासनिक सतर्कता और स्थानीय लोगों की चिंताएं ताजा हालात को देखते हुए बाराबंकी के प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले आम नागरिकों की चिंताएं अत्यधिक बढ़ गई हैं और वे अपनी संपत्ति तथा सुरक्षा को लेकर आशंकित हैं। मस्जिद के कटाव की चपेट में आने की घटना ने इस खतरे की गंभीरता को और अधिक उजागर कर दिया है, जिससे प्रशासनिक अमले पर भी त्वरित कार्रवाई करने का भारी दबाव बन गया है। सुरक्षा की दृष्टि से स्थानीय अधिकारी स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और प्रभावित इलाकों में राहत तथा बचाव कार्यों की रूपरेखा तैयार की जा रही है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि किस प्रकार से इस निरंतर कटान को रोकने के लिए तकनीकी उपाय लागू किए जाते हैं और विस्थापित या खतरे की जद में आए परिवारों को क्या सहायता पहुंचाई जाती है ताकि स्थिति को पूरी तरह नियंत्रण में लाया जा सके।