नाला सिकुड़ने से बिगड़े हालात गोरखपुर में स्थानीय स्तर पर सामने आई इस बड़ी समस्या के तहत एक मीटर चौड़ाई वाले विस्तृत नाले का आकार घटकर केवल एक फुट रह जाने का सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। शहरी क्षेत्रों में जल प्रबंधन और निकासी के लिए बनाए गए बड़े जलमार्गों पर इस प्रकार का संकुचन होना सीधे तौर पर प्रशासनिक उदासीनता और स्थानीय स्तर पर पनप रहे अवैध कब्जों की तरफ इशारा करता है। नाले की क्षमता अत्यधिक सीमित हो जाने के कारण जरा सी बारिश या घरेलू इस्तेमाल के बाद निकलने वाला अतिरिक्त पानी आगे नहीं बढ़ पा रहा है। इस स्थिति की वजह से जल प्रवाह का पूरा तंत्र अवरुद्ध हो चुका है और नाले का गंदा पानी आसपास की सड़कों तथा बस्तियों की तरफ लौटने लगा है। स्थानीय रहवासियों का कहना है कि जल निकासी का यह मुख्य मार्ग लंबे समय से उपेक्षा का शिकार था, जिसके चलते इसका दायरा धीरे-धीरे कम होता चला गया और आज यह नाला अपनी मूल क्षमता का दसवां हिस्सा भी नहीं संभाल पा रहा है। इस तकनीकी और व्यावहारिक संकट ने इलाके के लोगों का जीना मुहाल कर दिया है।
अतिक्रमण और प्रशासनिक अनदेखी भारतीय शहरी इलाकों में नालों और जलमार्गों के सिकुड़ने की यह प्रवृत्ति कोई नई नहीं है, बल्कि यह नियोजित विकास के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। गोरखपुर जैसे तेजी से फैलते हुए महानगरों में जब मुख्य नालों के दोनों किनारों पर पक्के निर्माण या अवैध कब्जे होने लगते हैं, तब जल निकासी का पूरा गणित बिगड़ जाता है। नगर निकायों और स्थानीय प्रशासन की यह जिम्मेदारी होती है कि वे समय-समय पर इन नालों की पैमाइश कराएं और अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें, लेकिन मैदानी स्तर पर अक्सर ऐसा होता नहीं दिखता है। जब तक स्थिति विकट नहीं हो जाती, तब तक विभागीय अधिकारी इस तरह की समस्याओं से मुंह फेरे रहते हैं। नाला सिकुड़ने की इस घटना के पीछे यह भी एक मुख्य कारण माना जा रहा है कि लंबे समय से इसकी ठीक से डीसिल्टिंग यानी सफाई नहीं कराई गई और न ही किनारों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस बाउंड्री या दीवार बनाई गई। नतीजा यह हुआ कि लोगों ने धीरे-धीरे नाले की जमीन पर कब्जा करके उसे सिकोड़ दिया, जिससे पूरा शहरी जल निकास ढांचा चरमरा गया है और इसका खामियाजा सीधे तौर पर आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।
बढ़ता खतरा और सुधार की मांग इस गंभीर समस्या के सामने आने के बाद अब स्थानीय नागरिकों और प्रबुद्ध वर्ग की तरफ से प्रशासन पर त्वरित कार्रवाई करने का भारी दबाव बनना शुरू हो गया है। लोगों का मानना है कि यदि जल्द ही इस संकरे नाले की चौड़ाई को वापस उसके मूल स्वरूप यानी एक मीटर तक नहीं लाया गया, तो आने वाले दिनों में स्थिति और अधिक भयावह हो सकती है। खासकर आगामी मानसूनी सीजन या सामान्य वर्षा के दौरान भी इस इलाके में गंभीर जलभराव की विकट समस्या पैदा हो सकती है, जिससे बीमारियां फैलने का खतरा भी कई गुना बढ़ जाएगा। इस पूरे मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध के स्वर तेज हो रहे हैं और लोग नगर निगम के वरिष्ठ अधिकारियों से मांग कर रहे हैं कि वे मौके पर आकर निरीक्षण करें। जनता चाहती है कि बिना किसी देरी के नाले के आसपास किए गए सभी अवैध कब्जों को बुलडोजर या अन्य कानूनी उपायों के जरिए हटाया जाए, ताकि पानी की आवाजाही सुचारू हो सके। इस दिशा में प्रशासन द्वारा उठाए जाने वाले आगामी कदम ही तय करेंगे कि गोरखपुर के इस हिस्से को जलभराव के इस कृत्रिम संकट से कब तक और कैसे राहत मिल पाती है।