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नाराजगी और आक्रोश: लखनऊ में एएनएम कर्मियों के विधानसभा घेराव के दौरान पुलिस ने रास्ता रोका और एक महिला कर्मी की आंखें छलक आईं

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्वास्थ्य विभाग से जुड़ी संविदा और नियमित कर्मियों ने अपनी मांगों के समर्थन में जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया। इस दौरान सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों को विधानसभा की तरफ बढ़ने से रोक दिया, जिससे मौके पर तनावपूर्ण माहौल बन गया और कई महिला कर्मियों का गुस्सा फूट पड़ा।

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Ankit Yadav
22 सित 2026, 17:30
नाराजगी और आक्रोश: लखनऊ में एएनएम कर्मियों के विधानसभा घेराव के दौरान पुलिस ने रास्ता रोका और एक महिला कर्मी की आंखें छलक आईं

विधानसभा कूच के दौरान पुलिस ने बैरिकेडिंग लगाकर रोका राजधानी लखनऊ की सड़कों पर उस वक्त भारी गहमागहमी देखने को मिली जब बड़ी संख्या में ऑक्जिलरी नर्स मिडवाइफ यानी एएनएम कर्मी अपनी विभिन्न मांगों को लेकर सड़कों पर उतर आए और उन्होंने राज्य की विधानसभा का घेराव करने के लिए आगे बढ़ने का प्रयास किया। इन महिला स्वास्थ्य कर्मियों का मुख्य उद्देश्य अपने अधिकारों और रोजगार से जुड़ी चिंताओं को सरकार के शीर्ष तक पहुंचाना था, जिसके लिए उन्होंने अनुशासित तरीके से मार्च निकाला। हालांकि, कानून व्यवस्था बनाए रखने और सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए स्थानीय प्रशासन तथा पुलिस बल ने रास्ते में ही मजबूत बैरिकेडिंग लगाकर उनके इस मार्च को पूरी तरह से रोक दिया। पुलिस द्वारा रोके जाने के बाद प्रदर्शनकारी महिलाएं और अधिक उग्र हो गईं तथा उन्होंने मौके पर ही सरकार विरोधी नारेबाजी शुरू कर दी। इस अप्रत्याशित रोक-टोक और गतिरोध के बीच एक महिला कर्मी अपने भीतर के दर्द और व्यवस्था के प्रति उपजे रोष को रोक नहीं पाई और फफक-फफक कर रो पड़ी। उसने सार्वजनिक रूप से यह बयान दिया कि सरकार द्वारा उनका लगातार शोषण किया जा रहा है, जिससे प्रशासनिक अमले में भी खलबली मच गई। इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हल्की धक्का-मुक्की भी हुई, जिसे नियंत्रित करने के लिए महिला पुलिस कर्मियों को भी भारी संख्या में तैनात किया गया था ताकि स्थिति नियंत्रण से बाहर न जाए।

संविदा और स्थायी स्वास्थ्य कर्मियों की कार्यप्रणाली और संघर्ष भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे में ऑक्जिलरी नर्स मिडवाइफ यानी एएनएम कर्मियों की भूमिका रीढ़ की हड्डी के समान मानी जाती है, जो ग्रामीण और शहरी इलाकों में गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं और टीकाकरण अभियानों की जिम्मेदारी संभालती हैं। इसके बावजूद इन स्वास्थ्य कर्मियों को अक्सर मानदेय की अनिश्चितता, नौकरी की सुरक्षा और अन्य बुनियादी सुविधाओं के अभाव का सामना करना पड़ता है, जो उनके अंदर लंबे समय से असंतोष का कारण बनता आ रहा है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं का सुचारू संचालन सुनिश्चित करने के लिए ये कर्मचारी जमीनी स्तर पर दिन-रात मेहनत करती हैं, लेकिन कई बार प्रशासनिक उदासीनता के कारण उनकी आवाज उच्च स्तर तक नहीं पहुंच पाती है। जब कभी भी ये कर्मी अपनी जायज मांगों या नियमितीकरण को लेकर आवाज उठाती हैं, तब उन्हें इस तरह के विरोध प्रदर्शनों का सहारा लेना पड़ता है, क्योंकि पारंपरिक संवाद के रास्ते अक्सर बंद नजर आते हैं। लखनऊ में हुए इस प्रदर्शन ने एक बार फिर से इस बात को उजागर कर दिया है कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले चिकित्सा कर्मचारियों और नीति निर्माताओं के बीच संवाद की एक बड़ी खाई मौजूद है। स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत कार्यरत इन कर्मचारियों का कहना है कि महंगाई के इस दौर में उन्हें जो आर्थिक लाभ मिलता है, उससे उनके परिवार का गुजारा चलाना बेहद कठिन हो गया है और शोषण का यह सिलसिला अब और अधिक सहन करने योग्य नहीं बचा है। इस प्रकार की घटनाएं केवल एक प्रशासनिक समस्या तक सीमित नहीं रहती हैं, बल्कि यह पूरे सरकारी तंत्र के भीतर काम करने वाले श्रमिकों के कल्याण और मानवाधिकारों से जुड़ा एक गंभीर विषय बन जाती हैं, जिस पर समाज के हर वर्ग का ध्यान आकर्षित होता है।

राजनीतिक सरगर्मी और आगामी प्रशासनिक प्रतिक्रिया की संभावना लखनऊ में हुए इस प्रदर्शन और महिला एएनएम के आंसुओं ने राज्य की राजनीतिक गलियारों में भी सुगबुगाहट तेज कर दी है, जिससे विपक्षी दलों को सरकार को घेरने का एक और बड़ा मुद्दा मिल गया है। इस घटना के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए स्वास्थ्य कर्मियों के साथ हो रहे कथित अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करना शुरू कर दिया है। आने वाले दिनों में यह आशंका जताई जा रही है कि यदि सरकार या स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों ने समय रहते इन प्रदर्शनकारी महिलाओं के साथ कोई सकारात्मक वार्ता नहीं की, तो यह आंदोलन और अधिक व्यापक रूप ले सकता है। प्रशासनिक हलकों से यह जानकारी भी सामने आ रही है कि स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए कुछ वरिष्ठ अधिकारी इस पूरे मामले की रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं ताकि सरकार के स्तर पर इस पर कोई ठोस नीतिगत निर्णय लिया जा सके। इन महिला कर्मियों की प्रमुख मांगों पर यदि जल्द ही कोई सहानुभूतिपूर्वक विचार नहीं किया गया, तो राज्यभर के अन्य जिलों में भी इस प्रकार के असंतोष की आग फैल सकती है, जिससे सरकार की छवि पर विपरीत असर पड़ सकता है। आम जनता और विभिन्न श्रमिक संगठन भी अब इस मुद्दे पर खुलकर इन स्वास्थ्य कर्मियों के समर्थन में खड़े होते दिखाई दे रहे हैं, जिससे प्रशासन पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अंततः यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि शासन इस संवेदनशील मामले में किस प्रकार का मध्यस्थता का रास्ता चुनता है और क्या इन पीड़ित महिलाओं को उनकी मेहनत का उचित हक और सम्मान मिल पाता है या नहीं।

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