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रिकॉर्ड गायब: उत्तराखंड में खतौनी दस्तावेज गायब होने पर आयोग ने कड़ा रुख अपनाया

उत्तराखंड में भूमि दस्तावेजों से जुड़ा एक बड़ा मामला सामने आया है, जहां खतौनी का आधिकारिक रिकॉर्ड गायब हो गया है। इस गंभीर लापरवाही पर राज्य के आयोग ने कड़ा रुख अपनाते हुए संबंधित अधिकारियों को रिकॉर्ड तलाश कर जल्द से जल्द उपलब्ध कराने के सख्त निर्देश दिए हैं।

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Ankit Yadav
04 सित 2026, 16:01
रिकॉर्ड गायब: उत्तराखंड में खतौनी दस्तावेज गायब होने पर आयोग ने कड़ा रुख अपनाया
उत्तराखंड राज्य में प्रशासनिक व्यवस्था और भूमि प्रबंधन से जुड़ा एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिससे सरकारी तंत्र में हड़कंप मच गया है। यहां जमीनों के अधिकारों और मालिकाना हक को साबित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक, खतौनी का आधिकारिक रिकॉर्ड ही गायब हो गया है। इस गंभीर प्रशासनिक चूक और लापरवाही का संज्ञान लेते हुए संबंधित आयोग ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। आयोग ने स्पष्ट शब्दों में निर्देश दिए हैं कि हर हाल में इस गायब दस्तावेज को खोजा जाए और रिकॉर्ड को सुरक्षित रूप से पुनर्स्थापित किया जाए ताकि आम नागरिकों को किसी भी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े।

भूमि दस्तावेजों की सुरक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारी

खतौनी जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण राजस्व दस्तावेज का गायब हो जाना इस बात का संकेत है कि जमीनी स्तर पर रिकॉर्ड रूम के रखरखाव और डिजिटल या भौतिक सुरक्षा व्यवस्था में भारी खामियां मौजूद हैं। किसी भी राज्य में खतौनी वह मूल दस्तावेज होता है जिसके जरिए किसान और आम नागरिक अपनी जमीन के रकबे, हिस्सेदारी और मालिकाना हक की पुष्टि करते हैं। यदि ऐसे दस्तावेज ही गायब होने लगें, तो इससे न केवल भू-माफियाओं और जालसाजों को बढ़ावा मिलता है, बल्कि आम जनता के कानूनी अधिकारों पर भी बड़ा संकट खड़ा हो जाता है। आयोग द्वारा इस मामले में दिखाई गई सख्ती से यह उम्मीद बंधती है कि लापरवाह अधिकारियों और कर्मचारियों पर जवाबदेही तय की जाएगी। आयोग के इस सख्त आदेश के बाद राजस्व विभाग और जिला प्रशासन के अधिकारियों में भारी खलबली मच गई है। रिकॉर्ड रूम के कर्मचारियों से लेकर उच्च अधिकारियों तक की नींद उड़ गई है क्योंकि दस्तावेजों को ढूंढकर पेश करने की तय समयसीमा और दबाव दोनों ही बढ़ गए हैं। प्रशासन अब इस बात की आंतरिक जांच भी कर रहा है कि आखिर यह रिकॉर्ड गायब कैसे हुआ, क्या यह किसी की सोची-समझी साजिश का हिस्सा है या फिर महज कार्यालयीन लापरवाही का नतीजा है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, यदि तय समय के भीतर यह रिकॉर्ड बरामद नहीं किया जाता है, तो इस मामले में कई बड़े और कठोर प्रशासनिक दंड देखने को मिल सकते हैं। इस घटना ने एक बार फिर से इस बात की आवश्यकता पर जोर दिया है कि उत्तराखंड समेत पूरे देश में भूमि अभिलेखों के आधुनिकीकरण और डिजिटलीकरण की प्रक्रिया में किसी भी तरह की ढिलाई नहीं बरती जानी चाहिए। जब तक दस्तावेजों के भौतिक स्वरूप के साथ-साथ उनका डिजिटल बैकअप पूरी तरह फूलप्रूफ नहीं होगा, तब तक इस तरह की गड़बड़ियों की आशंका बनी रहेगी। आम जनता और स्थानीय नागरिकों ने भी इस पूरे प्रकरण पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए मांग की है कि दोषियों के खिलाफ मिसाली कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में कोई भी विभाग इस प्रकार की संवेदनशीलता और लापरवाही दिखाने की हिम्मत न जुटा सके। आयोग की अगली कार्रवाई पर अब सबकी नजरें टिकी हुई हैं।
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