किशनगंज रेलवे स्टेशन पर आधुनिकीकरण कार्यों की धीमी प्रगति भारतीय रेलवे द्वारा देश भर के चुनिंदा महत्वपूर्ण स्टेशनों को अत्याधुनिक यात्री सुविधाओं से सुसज्जित करने के लिए बड़े पैमाने पर पुनर्विकास परियोजनाएं चलाई जा रही हैं। इसी कड़ी में पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के अंतर्गत आने वाले किशनगंज रेलवे स्टेशन को भी विश्व स्तरीय रूप देने की योजना बनाई गई थी ताकि यहाँ आने वाले यात्रियों को आधुनिक हवाई अड्डों जैसी उच्चस्तरीय सुविधाएं मिल सकें। हालांकि धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत नजर आ रही है और निर्माण कार्य अपनी तय रफ्तार से काफी पीछे चल रहा है। स्टेशन परिसर में चल रहे विकास कार्य लंबे समय से अपनी गति खो चुके हैं जिसके कारण प्लेटफॉर्मों पर यात्रियों का चलना तक दूभर हो गया है। निर्माण सामग्री के बिखरे होने और जगह-जगह खुदी पड़ी जमीन के कारण प्रतिदिन यात्रा करने वाले आम यात्रियों और विशेष तौर पर बुजुर्गों तथा महिलाओं को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय लोगों और नियमित यात्रियों का कहना है कि संबंधित निर्माण एजेंसियों की उदासीनता के कारण यह महत्वपूर्ण परियोजना अपनी तय समयसीमा के भीतर पूरी होती नहीं दिखाई दे रही है।
परियोजना की पृष्ठभूमि और सीमांचल क्षेत्र का रणनीतिक महत्व किशनगंज जंक्शन पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाला एक बेहद अहम रेल मार्ग है जहाँ से रोजाना दर्जनों एक्सप्रेस और राजधानी जैसी प्रीमियम ट्रेनें गुजरती हैं। इस क्षेत्र के भौगोलिक और सामरिक महत्व को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार और रेलवे बोर्ड ने यहाँ के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए करोड़ों रुपये के बजट का प्रावधान किया था। इस महत्वाकांक्षी पुनर्विकास योजना का मुख्य उद्देश्य स्टेशन परिसर का विस्तार करना, आधुनिक प्रतीक्षालय बनाना, स्वचालित सीढ़ियां लगाना, लिफ्ट की सुविधा देना और यात्रियों के लिए सुगम आवागमन सुनिश्चित करना था। इस प्रकार की बड़ी अवसंरचनात्मक परियोजनाओं के तहत आमतौर पर तकनीकी सर्वेक्षण, पर्यावरण मंजूरी और चरणबद्ध निर्माण कार्य की रूपरेखा तैयार की जाती है ताकि मौजूदा ट्रेन परिचालन पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े। लेकिन प्रशासनिक लालफीताशाही, ठेकेदारों की लचर कार्यशैली और समय पर सामग्री की आपूर्ति न हो पाने जैसी समस्याएं अक्सर ऐसी विकास योजनाओं की गति को धीमा कर देती हैं। सीमांचल जैसे संवेदनशील और व्यस्त व्यापारिक केंद्र में यदि परिवहन के बुनियादी ढांचे का विकास इस तरह से प्रभावित होता है तो इसका सीधा असर स्थानीय अर्थव्यवस्था और आम जनजीवन पर पड़ता है।
यात्रियों का असंतोष और रेलवे प्रशासन की अगली कार्रवाई निर्माण कार्य के इस तरह अधूरा और विलंबित रहने से स्थानीय रेल यात्रियों और विभिन्न सामाजिक संगठनों में भारी नाराजगी व्याप्त है। लोगों का मानना है कि यदि समय रहते उच्चाधिकारियों द्वारा इस परियोजना की नियमित मॉनिटरिंग की जाती तो आज यह स्थिति उत्पन्न नहीं होती। रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों को अब इस मामले का संज्ञान लेते हुए निर्माण एजेंसी पर शिकंजा कसना होगा ताकि बचे हुए कार्यों को युद्धस्तर पर पूरा कराया जा सके। आने वाले दिनों में यदि रेलवे प्रशासन द्वारा कोई सख्त कदम नहीं उठाया गया तो स्थानीय स्तर पर जन आंदोलन या धरना-प्रदर्शन जैसी स्थितियां भी बन सकती हैं। यात्रियों ने मांग की है कि निर्माण कार्य में हो रही देरी के कारणों की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और दोषियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए। दूसरी ओर, रेलवे के स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि कुछ तकनीकी अड़चनों और प्रशासनिक कारणों से काम की रफ्तार प्रभावित हुई है जिसे जल्द ही पटरी पर लाकर निर्धारित नई समयसीमा के भीतर पूरा करने का पूरा प्रयास किया जा रहा है।