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राजनीतिक संकट: देश में 40 वर्ष से कम उम्र के मात्र 384 सांसद और विधायक, Gen Z के लिए बड़ी चुनौती

देश की राजनीति में युवाओं की भागीदारी और प्रतिनिधित्व को लेकर एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है, जो आने वाली पीढ़ी के लिए चिंता का विषय है।

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Ankit Yadav
27 अग 2026, 14:35
राजनीतिक संकट: देश में 40 वर्ष से कम उम्र के मात्र 384 सांसद और विधायक, Gen Z के लिए बड़ी चुनौती
भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के गलियारों से एक बेहद दिलचस्प और विचारणीय आंकड़ा सामने आया है जो देश की विधायी संस्थाओं में युवाओं की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करता है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, पूरे देश में चालीस वर्ष से कम आयु वाले सांसदों और विधायकों की कुल संख्या मात्र तीन सौ चौरासी ही है। यह आंकड़ा इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि देश की राजनीति में अभी भी अनुभवी और बुजुर्ग चेहरों का दबदबा कायम है, जबकि देश की एक बहुत बड़ी आबादी युवाओं की है। इस स्थिति के कारण राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या हमारी चुनावी प्रणालियां और राजनीतिक दल युवा नेतृत्व को पर्याप्त अवसर दे पा रहे हैं या नहीं।

पारिवारिक पृष्ठभूमि का प्रभाव

राजनीति में प्रवेश करने वाले नए और युवा चेहरों की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो एक और हैरान करने वाली बात सामने आती है। आंकड़ों के अनुसार, सदन में पहुंचने वाला हर तीसरा नेता किसी न किसी राजनीतिक परिवार या राजनीतिक पृष्ठभूमि से संबंध रखता है। इसका सीधा मतलब यह है कि आम परिवार से आने वाले प्रतिभाशाली और महत्वाकांक्षी युवाओं के लिए मुख्यधारा की राजनीति में अपनी जगह बनाना बेहद कठिन होता जा रहा है। वंशवाद और राजनीतिक परिवारों का प्रभाव लगातार मजबूत बना हुआ है, जिसके चलते जमीन से जुड़कर राजनीति में ऊपर आने वाले युवाओं के रास्ते में कई तरह की बाधाएं खड़ी हो जाती हैं। राजनीतिक दलों के भीतर भी टिकट वितरण की प्रक्रिया अक्सर ऐसे ही परिवारों के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती है। आज की जेन ज़ेड यानी Gen Z पीढ़ी के लिए यह परिदृश्य एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में उभर रहा है। आधुनिक युग की तकनीक, नई सोच और बदलाव की चाह रखने वाले युवा जब देश की सबसे बड़ी पंचायतों यानी संसद और विधानसभाओं की ओर देखते हैं, तो उन्हें निराशा हाथ लगती है। नीति निर्माण प्रक्रिया में उनकी भागीदारी नगण्य होने के कारण युवाओं से जुड़े मुद्दों और आकांक्षाओं को उतनी प्रमुखता नहीं मिल पाती जितनी मिलनी चाहिए। तकनीकी रूप से उन्नत और वैश्वीकृत दुनिया में पल-बढ़ रही इस नई पीढ़ी के पास देश के भविष्य को संवारने के लिए अनूठे विचार और दृष्टिकोण हैं, लेकिन पारंपरिक राजनीतिक ढांचे में उनकी पैठ अभी भी बहुत सीमित है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राजनीतिक दलों ने अपनी कार्यसंस्कृति में बदलाव नहीं किया और अधिक से अधिक युवाओं को बिना किसी पारिवारिक पृष्ठभूमि के आगे बढ़ाने का निर्णय नहीं लिया, तो देश के बड़े युवा वर्ग का राजनीति से मोहभंग हो सकता है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह आवश्यक है कि हर वर्ग और हर आयु के लोगों को उचित प्रतिनिधित्व मिले। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या राजनीतिक दल Gen Z पीढ़ी की इन चुनौतियों को समझते हुए अपनी नीतियों में कोई बदलाव करते हैं या नहीं, ताकि आम परिवारों के युवा भी देश के नीति-निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभा सकें।
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