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राजनीतिक घमासान: ब्रिक्स सम्मेलन के शाकाहारी भोजन पर कांग्रेस और बीजेपी आमने-सामने
ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान परोसे जाने वाले शाकाहारी भोजन को लेकर देश की सियासत में जोरदार उबाल आ गया है, जहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के नेता आमने-सामने खड़े नजर आ रहे हैं।
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Ankit Yadav
14 सित 2026, 11:19
अंतरराष्ट्रीय मंचों और सम्मेलनों से जुड़े आयोजनों में भोजन और संस्कृति का मुद्दा अक्सर तूल पकड़ लेता है, और ताजा मामला ब्रिक्स सम्मेलन की थाली से जुड़ा हुआ है। सम्मेलन के दौरान मेहमानों के लिए तैयार किए गए विशुद्ध शाकाहारी मेन्यू को लेकर देश के प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। सत्ताधारी पार्टी और मुख्य विपक्षी दल के नुमाइंदे इस मसले पर एक-दूसरे पर वैचारिक थोपने और राजनीतिक रोटियां सेकने का गंभीर आरोप लगा रहे हैं, जिससे यह मामला कूटनीतिक से ज्यादा घरेलू राजनीति का मुख्य केंद्र बन गया है।
उत्तर प्रदेश और देश भर में सियासी हलचल
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लेकर धार्मिक नगरी अयोध्या तक इस राजनीतिक विवाद की गूंज साफ सुनाई दे रही है। राज्य के राजनीतिक गलियारों में इस बात पर लंबी चर्चाएं चल रही हैं कि कैसे वैश्विक स्तर के आयोजनों को भी घरेलू राजनीतिक प्राथमिकताओं के चश्मे से देखा जाने लगा है। जानकारों का मानना है कि इस तरह के सांस्कृतिक और खान-पान से जुड़े मुद्दे जनता के बीच भावनाओं को भड़काने का आसान जरिया बन जाते हैं, और दोनों ही दल आगामी रणनीतिक फायदों को ध्यान में रखते हुए इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहते हैं।
विपक्ष का तर्क है कि इस तरह के विषयों को अनावश्यक रूप से तूल देकर देश के वास्तविक और बुनियादी मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने का प्रयास किया जा रहा है। उनका कहना है कि बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक चुनौतियों जैसे विषयों पर बात करने के बजाय सांस्कृतिक प्राथमिकताओं और खान-पान को राष्ट्रीय बहस का मुख्य केंद्र बनाया जा रहा है, जो लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए ठीक नहीं है। दूसरी ओर, सत्ता पक्ष के नेताओं का मानना है कि पारंपरिक जीवनशैली और संस्कृति का सम्मान करना हर भारतीय का कर्तव्य है और इस पर सवाल उठाना देश की सांस्कृतिक धरोहर के खिलाफ एक सोची-समझी साजिश है।
आने वाले दिनों में इस गरमागरम बहस के और अधिक बढ़ने की पूरी संभावना है क्योंकि विभिन्न राज्यों के स्थानीय चुनावों और राजनीतिक गतिविधियों के मद्देनजर पार्टियां किसी भी मुद्दे को छोड़ने के मूड में नहीं हैं। विश्लेषकों का मानना है कि जब तक कोई नया बड़ा राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मुद्दा सुर्खियों में नहीं आता, तब तक ब्रिक्स की थाली और खान-पान का यह सियासी संग्राम मीडिया और राजनीतिक मंचों पर पूरी तरह छाया रहेगा, जिससे दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार जारी रहेगा।