गोरखपुर के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों पिछड़ी जातियों की संख्या और उनकी चुनावी अहमियत को लेकर नए सिरे से गुणा-गणित बिठाया जा रहा है। स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस क्षेत्र में सामाजिक ताना-बाना ऐसा है कि हर दल अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए इन मतदाताओं को अपने पाले में लाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। इसके साथ ही, आरक्षित सीटों का मुद्दा भी काफी संवेदनशील बना हुआ है, क्योंकि इन सीटों पर जीत हार का अंतर तय करने में पिछड़ी जातियों के साथ-साथ अन्य स्थानीय समुदायों की भी बड़ी भूमिका होती है। राजनीतिक दल लगातार उन तमाम कारकों का बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं जो इन आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के चुनावी नतीजों को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकते हैं।
इस तरह के चुनावी समीकरणों का इतिहास उत्तर प्रदेश की राजनीति में हमेशा से बहुत गहरा और प्रभावशाली रहा है, विशेषकर पूर्वांचल के इस अहम क्षेत्र में जहां सामाजिक और जातीय गठबंधन ही किसी भी राजनीतिक दल के भविष्य का निर्धारण करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में गोरखपुर के राजनीतिक परिदृश्य में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए हैं, जिनमें विकास के नए मुद्दों के साथ-साथ पारंपरिक जातीय समीकरणों को साधने की पुरानी परंपरा भी मजबूती से कायम है। विभिन्न राजनीतिक दलों के रणनीतिकार इस बात को भली-भांति समझते हैं कि केवल एक वर्ग के सहारे चुनाव जीतना असंभव है, इसलिए वे सभी समुदायों विशेषकर पिछड़ी जातियों के बीच अपनी पैठ मजबूत करने के लिए विभिन्न अभियानों और संवाद कार्यक्रमों पर जोर दे रहे हैं। स्थानीय स्तर पर हो रही बैठकों और राजनीतिक गतिविधियों से यह स्पष्ट होता है कि चुनावी टिकटों के बंटवारे से लेकर जमीनी प्रचार तक हर चरण में जातीय और सामाजिक संतुलन को प्राथमिकता दी जा रही है।
आने वाले समय में गोरखपुर का यह राजनीतिक समीकरण किस दिशा में करवट लेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन सा दल इन आरक्षित सीटों पर सबसे सटीक और प्रभावी उम्मीदवार उतारने में सफल होता है। स्थानीय मतदाताओं की बढ़ती राजनीतिक जागरूकता और विकासोन्मुखी सोच ने भी दलों के लिए पारंपरिक समीकरणों के साथ-साथ नए मुद्दों पर ध्यान देना अनिवार्य कर दिया है। जैसे-जैसे चुनावी सुगबुगाहट तेज होगी, वैसे-वैसे इन आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की लड़ाई और अधिक दिलचस्प होने की पूरी संभावना है, क्योंकि सभी प्रमुख दल अपनी जमीन मजबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं। जनता के बीच भी इन मुद्दों पर खुलकर चर्चा हो रही है और हर कोई यह जानने के लिए उत्सुक है कि इस बार का चुनावी ऊँट किस कर बैठता है, जिससे क्षेत्र की राजनीति का आगामी नक्शा तैयार होगा।