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राजनीति

सदन में सन्नाटा: राजस्थान विधानसभा मानसून सत्र के दौरान विपक्ष का एक भी सदस्य नहीं दिखा उपस्थित

राजस्थान विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान एक अजीब और अप्रत्याशित दृश्य देखने को मिला, जब सदन के भीतर विपक्ष का कोई भी विधायक नजर नहीं आया।

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Ankit Yadav
21 अग 2026, 18:40
सदन में सन्नाटा: राजस्थान विधानसभा मानसून सत्र के दौरान विपक्ष का एक भी सदस्य नहीं दिखा उपस्थित
राजस्थान की राजधानी जयपुर में इन दिनों विधानसभा का मानसून सत्र काफी सुर्ख़ियों में बना हुआ है। हाल ही में इस सत्र की कार्यवाही के दौरान एक बेहद हैरान कर देने वाला और असामान्य वाकया सामने आया, जब सदन की कार्यवाही शुरू होने के बाद भी विपक्षी दलों का एक भी सदस्य अपनी सीट पर उपस्थित नहीं था। पूरा का पूरा विपक्षी खेमा इस महत्वपूर्ण सत्र की कार्यवाही से पूरी तरह नदारद दिखा, जिससे सदन के भीतर का माहौल काफी फीका और वीरान नजर आया।

विधानसभा स्पीकर की गहरी नाराजगी

विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने इस घटनाक्रम पर अपनी गहरी पीड़ा और असंतोष खुलकर व्यक्त किया। उन्होंने सदन में खाली पड़ी कुर्सियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि जन प्रतिनिधियों द्वारा इस तरह से सदन की कार्यवाही का बहिष्कार करना या उपस्थित न रहना बेहद दुखद है। स्पीकर देवनानी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि इन खाली कुर्सियों को देखकर उनके मन में गहरी पीड़ा होती है, क्योंकि लोकतंत्र का असली मंदिर जनता के मुद्दों पर चर्चा करने के लिए होता है और ऐसे में विपक्षी सदस्यों का सदन से गायब रहना लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुकूल नहीं है। इस तरह की राजनीतिक परिस्थितियां अमूमन तब उत्पन्न होती हैं जब सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच किसी गंभीर मुद्दे पर तीखा गतिरोध चल रहा हो या फिर किसी नीतिगत फैसले को लेकर विरोध दर्ज कराना हो। हालांकि, सदन का सुचारू रूप से संचालन करने और राज्य से जुड़े महत्वपूर्ण विधायी कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए दोनों पक्षों की मौजूदगी बेहद जरूरी मानी जाती है। जब विपक्षी दल सदन की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लेते हैं, तो राज्य की जनता के महत्वपूर्ण मसले और जनहित से जुड़े सवाल बिना किसी व्यापक चर्चा के ही रह जाते हैं।

लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर उठ रहे हैं सवाल

संसदीय लोकतंत्र में सत्ता पक्ष की भूमिका जितनी अहम होती है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी विपक्ष की भी होती है कि वह सरकार से सवाल पूछे और जनहित के मुद्दों पर कड़ा रुख अपनाए। लेकिन जब सदन के भीतर सिर्फ सत्ता पक्ष के चेहरे ही नजर आएं और विपक्ष की तरफ की बेंचें पूरी तरह खाली हों, तो सदन की सार्थकता पर कई तरह के सवाल खड़े होने लगते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार के बहिष्कार से अंततः जनता के कार्यों और उनके विकास की गति पर ही असर पड़ता है। आने वाले दिनों में इस बात की पूरी संभावना है कि इस घटना को लेकर राज्य की राजनीति में बयानबाजी और तेज होगी। सत्ता पक्ष के नेता इस वाकये को लेकर विपक्षी दलों की कार्यशैली पर सवाल उठाएंगे, वहीं विपक्षी खेमा भी अपने विरोध के पीछे के कारणों को जनता के सामने मजबूती से रखने का प्रयास करेगा। स्पीकर द्वारा जताई गई पीड़ा के बाद अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या आगामी बैठकों में सदन की रौनक लौटेगी और सभी विधायक अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए सदन में शामिल होंगे या फिर गतिरोध का यह दौर यूं ही आगे भी जारी रहेगा।
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