पाकिस्तान के भीतर गहराते वित्तीय संकट के मद्देनजर सरकार ने सरकारी खजाने पर पड़ रहे बोझ को कम करने के लिए कई सख्त और त्वरित कदम उठाए हैं। ताजा प्रशासनिक फैसलों के अनुसार देश भर में सरकारी खर्चों में भारी कटौती का ऐलान किया गया है, ताकि राजकोषीय घाटे को संभाला जा सके। इसके साथ ही देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और ऊर्जा संरक्षण के उपायों के तहत व्यापारिक प्रतिष्ठानों और बाजारों को रात दस बजे तक ही खुला रखने का निर्देश दिया गया है। आम जनता के आयोजनों पर भी लगाम कसी गई है, जिसके अंतर्गत अब शादियों और अन्य समारोहों में मेहमानों को परोसी जाने वाले व्यंजनों की संख्या घटाकर केवल एक डिश तक सीमित कर दी गई है। इन सभी उपायों का मुख्य उद्देश्य देश के घटते विदेशी मुद्रा भंडार को बचाना और फिजूलखर्ची पर पूरी तरह रोक लगाना है।
इस प्रकार के आपातकालीन आर्थिक उपायों के पीछे पाकिस्तान की लंबे समय से चली आ रही गंभीर वित्तीय बदहाली और भारी विदेशी कर्ज का दबाव मुख्य कारण रहा है। पिछले कुछ वर्षों से देश का केंद्रीय बैंक और वित्त मंत्रालय लगातार विदेशी मुद्रा संकट, बेलआउट पैकेज की शर्तों और बढ़ती महंगाई से जूझ रहे हैं। सरकार द्वारा उठाए गए ये कदम अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और अन्य वैश्विक वित्तीय संस्थानों द्वारा वित्तीय अनुशासन बहाल करने के लिए दिए गए सुझावों और दबावों का ही एक हिस्सा माने जा रहे हैं। देश में आयात और ऊर्जा खपत को नियंत्रित करने के लिए पहले भी प्रशासन द्वारा कई तरह की पाबंदियां लगाई जाती रही हैं, लेकिन मौजूदा हालात इतने विकट हो चुके हैं कि अब प्रशासनिक और सार्वजनिक जीवन के हर स्तर पर सीधे हस्तक्षेप किए जा रहे हैं।
इन नए प्रतिबंधों और खर्चों में कटौती के फैसलों का देश की आम जनता, व्यापारियों और मध्यम वर्ग पर गहरा असर पड़ना तय माना जा रहा है। बाजारों के समय सीमित होने से खुदरा व्यापार और नाइटलाइफ़ से जुड़े व्यवसायों को भारी वित्तीय नुकसान का सामना करना पड़ सकता है, जबकि शादियों और समारोहों पर लगे प्रतिबंधों से खान-पान और इवेंट मैनेजमेंट से जुड़े उद्योगों में निराशा का माहौल है। दूसरी ओर, सरकार का मानना है कि यदि इस तरह के कड़े अनुशासनहीन कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में देश को और भी बदतर आर्थिक पतन का सामना करना पड़ सकता है। विश्लेषकों का यह भी मानना है कि जब तक देश में उत्पादन और निर्यात के मोर्चे पर ठोस सुधार नहीं किए जाते, तब तक केवल प्रशासनिक प्रतिबंधों से इस दीर्घकालिक संकट से पूरी तरह पार पाना बेहद कठिन होगा।