संगठन की बैठक में कश्मीर का संदर्भ संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा सत्र के दौरान इस्लामिक सहयोग संगठन यानी ओआईसी ने आधिकारिक तौर पर पाकिस्तान की मंशा के अनुरूप बयान जारी करते हुए कश्मीरियों के आत्मनिर्णय के अधिकार के प्रति अपना समर्थन दोहराया है। इस उच्च स्तरीय बैठक के दौरान संगठन के प्रतिनिधियों ने वैश्विक मंचों पर लगातार उठाई जा रही पाकिस्तानी आपत्तियों और बयानों का हवाला दिया। इस प्रकार की कार्रवाइयां इस बात को स्पष्ट करती हैं कि कैसे कुछ चुनिंदा मंचों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ एजेंडा चलाने के लिए बार-बार किया जाता है। वैश्विक कूटनीति के जानकारों का मानना है कि इस तरह के बयानों में कोई नयापन नहीं होता है बल्कि यह केवल अपने सदस्य देशों के राजनीतिक हितों को साधने का एक पुराना तरीका मात्र बनकर रह गया है। संयुक्त राष्ट्र जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में इस तरह के मुद्दों को बार-बार घसीटना इस बात का प्रमाण है कि संबंधित देश कूटनीतिक रूप से विफल होने के बाद इस प्रकार के संगठनों का सहारा लेने के लिए विवश हो जाते हैं।
संगठन की कार्यप्रणाली और उसका प्रभाव इस्लामी सहयोग संगठन लंबे समय से अपने बयानों और प्रस्तावों के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रीय विवादों पर अपनी राय रखता आया है, जिसमें दक्षिण एशिया का यह संवेदनशील मुद्दा भी शामिल रहा है। हालांकि इस संगठन की ओर से आने वाले अधिकांश बयानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह गंभीरता या वैधता नहीं मिलती है जिसकी ये देश अपेक्षा करते हैं। भारत सरकार ने अतीत में भी ऐसे सभी प्रस्तावों को सिरे से खारिज किया है और स्पष्ट शब्दों में यह कहा है कि देश के आंतरिक मामलों पर किसी भी बाहरी या बहुपक्षीय निकाय को टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है। कूटनीतिक गलियारों में यह सर्वविदित है कि ओआईसी के भीतर कुछ ऐसे देश सक्रिय हैं जो निरंतर पाकिस्तान के प्रभाव में आकर भारत विरोधी एजेंडे को हवा देने का काम करते हैं। इसके बावजूद, वैश्विक समुदाय के बड़े हिस्से का यह मानना है कि द्विपक्षीय मुद्दों को केवल संबंधित देशों के बीच ही सुलझाया जा सकता है, न कि इस तरह के पक्षपातपूर्ण संगठनों के माध्यम से। ऐसे बयानों से क्षेत्रीय शांति की बहाली में कोई रचनात्मक मदद नहीं मिलती है बल्कि इससे केवल आपसी अविश्वास और कटुता ही बढ़ती है।
कूटनीतिक मोर्चे पर भारत की मजबूत स्थिति इस ताजा घटनाक्रम के बाद भारतीय कूटनीतिक खेमे की ओर से अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को पूरी दृढ़ता के साथ रेखांकित किए जाने की पूरी संभावना है। भारत ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि जम्मू और कश्मीर देश का अभिन्न अंग है और विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है, जहां आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई गई है। जब भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस प्रकार के प्रायोजित एजेंडे को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जाता है, तब भारत के प्रतिनिधि इसका माकूल और कड़ा जवाब देते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कूटनीतिक स्तर पर इस बयान की औपचारिक तौर पर क्या प्रतिक्रिया दी जाती है। कुल मिलाकर, इस तरह के बयानों का जमीन पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है क्योंकि भारत ने अपनी संप्रभुता और अखंडता के मामले में कभी भी किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने से इनकार किया है।