मार्को रुबियो की वीजा नियमों पर सफाई
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने हाल ही में लागू किए गए कड़े वर्क वीजा प्रावधानों को लेकर अपनी बात रखी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ट्रंप प्रशासन के ये नए नियम किसी एक खास देश को ध्यान में रखकर तैयार नहीं किए गए हैं। इन बदलावों के दायरे में वे तमाम लोग आते हैं जो वहां जाकर सेवा देना चाहते हैं तथा वे संस्थान भी प्रभावित होते हैं जो उन्हें अपने यहां बुलाना चाहते हैं। प्रशासन अपनी पूरी व्यवस्था में लंबे समय से चली आ रही खामियों को दूर करने का प्रयास कर रहा है ताकि व्यवस्था को दुरुस्त किया जा सके। सरकार का मुख्य उद्देश्य अपनी जनता और काम करने वाले नागरिकों को सर्वोच्च प्राथमिकता देना है। यह कदम वैश्विक स्तर पर लागू किया जा रहा है और इसका दायरा पूरी दुनिया के लिए है। रुबियो ने माना कि जिन देशों के नागरिकों पर इसका अधिक प्रभाव पड़ता है, उन्हें ऐसा लग सकता है कि उन्हें लक्षित किया जा रहा है, लेकिन वास्तविक स्थिति ऐसी नहीं है। अमेरिका में पहले से काम करने वाले विदेशी नागरिकों और तकनीकी संस्थानों पर इन नए निर्णयों का व्यापक असर देखा जा रहा है। सरकार का यह स्पष्ट मानना है कि किसी भी देश को विशेष रूप से निशाना नहीं बनाया गया है बल्कि यह नियमों की व्यापक समीक्षा का हिस्सा है।
घरेलू हितों को प्राथमिकता और राजदूत का समर्थन
अमेरिकी प्रशासन का रुख साफ करते हुए यह बताया गया है कि देश अपनी जनता के कल्याण को सबसे ऊपर रखेगा। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार जिस तरह कोई भी सरकार अपने नागरिकों के हितों का ध्यान रखती है, उसी प्रकार उनका देश भी अपने कामगारों को प्रथम स्थान देगा। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी इस नीति का पूर्ण समर्थन करते हुए बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस पूरी प्रक्रिया का दायरा केवल एक राष्ट्र तक सीमित नहीं है बल्कि संपूर्ण विश्व पर इसका विस्तार है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि 'अमेरिका फर्स्ट ' का अर्थ अमेरिका अलोन' कतई नहीं है और हर संप्रभु देश को अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने का पूरा अधिकार है। पिछली सरकारों के कार्यकाल में सीमाओं पर नियंत्रण की कमी और अन्य खामियों के कारण इन नीतियों की समीक्षा करना आवश्यक हो गया था। अमेरिकी प्रशासन का यह भी मानना है कि व्यापार और आव्रजन के मामलों को लेकर दोनों देशों के बीच उपजे मतभेदों को आपसी संबंधों तथा साझा हितों के माध्यम से आसानी से सुलझाया जा सकता है। इन तमाम वार्ताओं और बयानों के जरिए कूटनीतिक स्तर पर यह समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि किसी भी प्रकार का भेदभावपूर्ण रवैया नहीं अपनाया गया है बल्कि यह उनकी अपनी व्यवस्था को सुधारने की एक सतत प्रक्रिया है।
विस्तृत वीजा बदलाव और भारतीय पेशेवरों पर असर
हालिया संशोधनों के अंतर्गत अमेरिका के H-1B वीजा नियमों में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए हैं जिनके तहत विशेष दक्षता वाले पदों पर विदेशी नागरिकों को नियुक्त किया जाता है। चूंकि इन पदों पर भारतीय नागरिकों की संख्या काफी अधिक है, इसलिए इस वर्ग के लोगों और विदेशी प्रतिभाओं पर निर्भर कंपनियों को इसका सीधा सामना करना पड़ रहा है। सबसे बड़ा बदलाव यह किया गया है कि वीजा के नवीनीकरण के समय पहले से स्वीकृत एक्सटेंशन पर मिलने वाली रक्षा नीति को समाप्त कर दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप अब पुराने और स्वीकृत एक्सटेंशन मामलों की भी नए सिरे से बेहद कड़ी जांच की जाएगी, जिससे वहां सेवारत भारतीयों के समक्ष वीजा खारिज होने या प्रक्रिया में लंबी देरी का खतरा काफी बढ़ गया है। इसके अलावा नए ऑफशोर आवेदकों के लिए प्रवेश प्रतिबंधों को सितंबर 2027 तक आगे बढ़ा दिया गया है। इस प्रावधान के तहत देश की सीमाओं के बाहर से भेजी जाने वाली कुछ चुनिंदा नई याचिकाओं पर एक लाख डॉलर की भारी फीस का नियम भी बरकरार रखा गया है। इन तमाम तकनीकी और वित्तीय बाधाओं के चलते भारतीय प्रौद्योगिकी कर्मियों और विदेशी पेशेवरों की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। सरकार का तर्क है कि यह सब आव्रजन प्रणाली में लंबे समय से चली आ रही धोखाधड़ी और दुरुपयोग को रोकने के लिए आवश्यक था।