वार्ता में प्रगति और शेष अड़चनें भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चली आ रही व्यापारिक वार्ताओं में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर हासिल कर लिया गया है, जिसके तहत दोनों देशों के बीच कुल मसौदे का नब्बे प्रतिशत हिस्सा पूरी तरह से तय माना जा रहा है। इस प्रगति के बाद अब अर्थशास्त्रियों और कूटनीतिक विश्लेषकों की निगाहें उस शेष दस प्रतिशत हिस्से पर टिकी हुई हैं, जिसे इस पूरी प्रक्रिया का सबसे कठिन और संवेदनशील पड़ाव बताया जा रहा है। दोनों पक्षों के वार्ताकारों ने शुरुआती दौर में कई तकनीकी और आर्थिक बाधाओं को सफलतापूर्वक पार कर लिया है, लेकिन कुछ विशेष क्षेत्रों में नीतियों और नियमों को लेकर अभी भी गहरे मतभेद बने हुए हैं। किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते में शुरुआती दौर के समझौते तुलनात्मक रूप से आसान होते हैं क्योंकि उनमें दोनों देशों के साझा हित जल्दी जुड़ जाते हैं, किंतु अंतिम चरण हमेशा उन बेहद पेचीदा विषयों से जुड़ा होता है जिन पर दोनों सरकारें अपने घरेलू राजनीतिक और आर्थिक हितों के कारण कोई भी समझौता करने से बचना चाहती हैं। इस स्थिति के कारण समझौते को अंतिम रूप देने की गति थोड़ी धीमी पड़ सकती है।
द्विपक्षीय संबंधों और नीतियों की पृष्ठभूमि इस प्रकार के वृहद व्यापारिक समझौतों का इतिहास यह बताता है कि दोनों बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच बाजार तक पहुंच, शुल्क दरों, बौद्धिक संपदा अधिकारों और कृषि सब्सिडी जैसे संवेदनशील विषयों पर हमेशा से कड़ा संघर्ष देखने को मिलता है। जब भी दो लोकतांत्रिक देश आपसी व्यापार को बढ़ावा देने के लिए आगे आते हैं, तो उन्हें अपने घरेलू उद्योगों, किसानों और विनिर्माण क्षेत्रों के हितों की रक्षा करने की गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ता है। अमेरिका में जहां घरेलू स्तर पर रोजगार सुरक्षा और औद्योगिक मानकों को प्राथमिकता दी जाती है, वहीं भारत अपने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के साथ-साथ कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के हितों से किसी भी प्रकार का समझौता करने से बचता है। यही कारण है कि नब्बे प्रतिशत काम आसानी से पूरा होने के बावजूद, बचा हुआ दस प्रतिशत हिस्सा दोनों देशों के शीर्ष नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी परीक्षा बन गया है। इस पूरी प्रक्रिया में विभिन्न मंत्रालयों के अधिकारी, व्यापार प्रतिनिधि और कूटनीतिक दल महीनों से लगातार मंथन कर रहे हैं ताकि दोनों देशों के बाजारों के लिए एक संतुलित और लाभकारी रास्ता निकाला जा सके, जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को भी मजबूती प्रदान कर सके।
संभावित प्रभाव और आगामी रणनीतिक कदम आने वाले हफ्तों में इस व्यापार समझौते के बचे हुए बिंदुओं को सुलझाने के लिए दोनों देशों के उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडलों के बीच कई दौर की और बैठकें होने की पूरी संभावना है। यदि दोनों पक्ष अंतिम दस प्रतिशत के पेचीदा मुद्दों पर किसी ठोस समझौते पर पहुंचने में सफल हो जाते हैं, तो इससे दोनों देशों के बीच आयात और निर्यात के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत होगी और द्विपक्षीय आर्थिक साझेदारी को अभूतपूर्व गति मिलेगी। हालांकि, यदि ये मतभेद दूर नहीं होते हैं, तो इस ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर करने की प्रक्रिया में और अधिक विलंब हो सकता है, जिसका असर दोनों देशों के रणनीतिक और व्यावसायिक संबंधों पर भी पड़ सकता है। वैश्विक बाजार इस समय इस वार्ता पर बेहद बारीकी से नजर बनाए हुए है क्योंकि इस डील के सफल होने से न केवल दोनों देशों के उद्योगों को सीधा लाभ मिलेगा, बल्कि पूरी दुनिया में मुक्त और निष्पक्ष व्यापार के प्रति एक सकारात्मक संदेश भी जाएगा। निवेशकों और उद्योगपतियों को उम्मीद है कि दोनों सरकारें आपसी कूटनीतिक कौशल का परिचय देते हुए इन अंतिम बाधाओं को भी जल्द ही पार कर लेंगी।