प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में नए कदम
पारंपरिक और रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों से बचने के लिए अब प्राकृतिक तौर-तरीकों को अपनाने पर जोर दिया जा रहा है। इसी सिलसिले में खेती-किसानी से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा तेज हो गई है। वीरेंद्र सिंह मस्त ने इस बात पर विशेष बल दिया है कि किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। आधुनिक समय में जब मिट्टी की उर्वरता लगातार कम हो रही है, तब इस तरह की पद्धतियां बेहद महत्वपूर्ण हो जाती हैं। देश भर के किसान और कृषि विशेषज्ञ इस बात को लेकर लगातार अपनी राय रख रहे हैं कि किस तरह से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है। सरकार और संबंधित विभागों द्वारा भी इस दिशा में कई प्रकार की योजनाएं चलाई जा रही हैं ताकि किसानों को आर्थिक संबल मिल सके। पारंपरिक कृषि पद्धतियों की ओर लौटने का यह समय किसानों के लिए नए अवसर लेकर आ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस प्रकार की कृषि को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए कई स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं।
वित्तीय अनुदान और बाजार की उपलब्धता का महत्व
खेती करने वाले मेहनतकश लोगों के लिए यह आवश्यक है कि उनकी मेहनत का सही दाम मिले और उन्हें शुरुआती स्तर पर आर्थिक सहायता प्राप्त हो। वीरेंद्र सिंह मस्त ने इस बात को प्रमुखता से उठाया है कि किसानों को अनुदान और उचित बाजार दोनों की प्राप्ति सुनिश्चित होनी चाहिए। जब तक कृषि उत्पादों को बेचने के लिए सही बाजार नहीं मिलेगा, तब तक किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार होना बहुत कठिन है। इसके अलावा उत्पादन लागत को कम करने के लिए वित्तीय अनुदान सीधे तौर पर मददगार साबित होते हैं। कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि यदि समय पर सहायता मिल जाए तो ग्रामीण इलाकों में पलायन की समस्या को भी काफी हद तक रोका जा सकता है। बिचौलियों की भूमिका को समाप्त करके किसानों को सीधे तौर पर लाभ पहुंचाने के लिए सुदृढ़ व्यवस्थाएं बनाने की मांग लंबे समय से की जा रही है। बाजार में प्राकृतिक रूप से उपजाई गई वस्तुओं की मांग लगातार बढ़ रही है, जिसका सीधा लाभ उत्पादकों को मिलना चाहिए।
कृषि क्षेत्र में सुधार और टिकाऊ विकास की पृष्ठभूमि
देश की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान हमेशा से ही अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है और इसमें सुधार के लिए समय-समय पर नीतिगत बदलाव किए जाते हैं। अतीत में अपनाई गई हरित क्रांति की पद्धतियों ने खाद्यान्न उत्पादन में तो देश को आत्मनिर्भर बनाया, लेकिन इसके साथ ही पर्यावरण और भूमि की सेहत पर भी विपरीत प्रभाव डाले। इन दुष्प्रभावों से निपटने के लिए ही अब प्राकृतिक खेती और जैविक खेती को पुनर्जीवित करने पर जोर दिया जा रहा है ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए उपजाऊ भूमि सुरक्षित रह सके। इस प्रकार की कृषि प्रणाली से न केवल लागत में कमी आती है, बल्कि रासायनिक खादों पर निर्भरता भी समाप्त होती है। उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की दृष्टि से भी प्राकृतिक रूप से उगाया गया अनाज और सब्जियां अधिक लाभदायक मानी जाती हैं। नीति निर्माताओं और कृषि क्षेत्र के दिग्गजों द्वारा इस विषय पर लगातार संवाद स्थापित किया जा रहा है ताकि जमीनी स्तर पर सकारात्मक बदलाव लाए जा सकें। भविष्य की कृषि नीतियों का मुख्य उद्देश्य टिकाऊ विकास और किसानों की आय में वृद्धि करना ही होना चाहिए।