विदेशी मुद्रा भंडार का न्यूनतम स्तर पर पहुंचना भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास में वर्ष 1991 का समय अत्यंत चुनौतीपूर्ण दौर के रूप में दर्ज है जब देश के नीति निर्माताओं को अभूतपूर्व वित्तीय बाधाओं का सामना करना पड़ा था। उस विशेष समय में केवल घरेलू स्तर पर ही नहीं बल्कि विदेशी व्यापार और भुगतान संतुलन के मोर्चे पर भी अत्यंत गंभीर परिस्थितियां उत्पन्न हो गई थीं। देश का विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया था कि वह बमुश्किल कुछ ही हफ्तों के आयात का खर्च उठाने में सक्षम था। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अन्य भू-राजनीतिक कारणों से आयात बिल लगातार बढ़ता जा रहा था जबकि निर्यात से होने वाली आय उस अनुपात में नहीं बढ़ पा रही थी। इसके परिणामस्वरुप देश को अपने जरूरी विदेशी कर्जों और बकाये चुकाने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था और वैश्विक वित्तीय संस्थानों के सामने देश की विश्वसनीयता पर संकट के बादल मंडराने लगे थे। सरकार के पास अपनी वित्तीय जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए अत्यंत सीमित विकल्प बचे थे और हर तरफ आर्थिक अस्थिरता का माहौल पूरी तरह से हावी हो चुका था।
आंतरिक वित्तीय असंतुलन और राजकोषीय घाटा विदेशी मोर्चे की इन विकट परिस्थितियों के साथ-साथ देश के भीतर भी राजकोषीय घाटा और मुद्रास्फीति अपने रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच चुके थे जिससे आम जनजीवन और व्यापारिक गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित होने लगी थीं। सरकारी खर्चों में लगातार हो रही वृद्धि और राजस्व प्राप्ति के स्रोतों में आई गिरावट के कारण देश का राजकोषीय संतुलन पूरी तरह से बिगड़ चुका था। बैंकिंग प्रणाली और वित्तीय बाजारों में नकदी की भारी किल्लत महसूस की जा रही थी जिसके कारण उद्योग जगत नए निवेश करने से कतरा रहा था और उत्पादन गतिविधियों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही थी। इस प्रकार के आंतरिक और बाह्य आर्थिक दबावों ने मिलकर देश की संपूर्ण अर्थव्यवस्था को एक बड़े संकट के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया था जिससे पार पाना तत्कालीन सरकार के लिए एक बेहद कठिन चुनौती बन गया था। देश के भीतर बढ़ती बेरोजगारी और महंगाई ने आम नागरिकों की कमर तोड़ दी थी तथा बाजार में आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित रखना प्रशासन के लिए एक विकट समस्या बनता जा रहा था। इन तमाम घरेलू विसंगतियों ने विदेशी निवेशकों का मनोबल भी गिरा दिया था जिससे देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रवाह लगभग ठप पड़ गया था और हर तरफ निराशाजनक माहौल व्याप्त था।
नीतिगत बदलाव और सुधारों की ऐतिहासिक शुरुआत इस दोहरे संकट से देश को उबारने के लिए उस समय दूरगामी और कड़े नीतिगत निर्णय लेने की सख्त आवश्यकता महसूस की गई जिसके परिणामस्वरुप भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा को पूरी तरह से बदलने वाले ऐतिहासिक सुधारों की रूपरेखा तैयार की गई। सरकार और केंद्रीय बैंक ने मिलकर विदेशी व्यापार को बढ़ावा देने लाइसेंस राज को शिथिल करने और विदेशी निवेश के लिए द्वारों को खोलने जैसे महत्वपूर्ण कदम उठाए ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ देश का एकीकरण सुगम हो सके। इन दूरदर्शी बदलावों ने न केवल उस समय के आसन्न दिवालियापन से देश को सुरक्षित बाहर निकाला बल्कि भविष्य के लिए मजबूत आर्थिक विकास की नींव भी रखी। इन सुधारों के माध्यम से भारतीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा बढ़ी जिससे उद्योगों को अपनी कार्यक्षमता सुधारने का अवसर मिला और देश धीरे-धीरे एक मजबूत वैश्विक आर्थिक ताकत के रूप में उभरने लगा। आज के समय में जब उस दौर का विश्लेषण किया जाता है तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उन कठिन परिस्थितियों ने ही भारत को अपनी आर्थिक नीतियों का पुनर्मूल्यांकन करने और एक अधिक लचीली व आधुनिक व्यवस्था अपनाने के लिए बाध्य किया था।