रेशमबाग मैदान में शताब्दी वर्ष का मुख्य आयोजन
महाराष्ट्र के नागपुर शहर में स्थित रेशमबाग मैदान के प्रांगण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मंगलवार के दिन अपना पारंपरिक और वार्षिक विजयादशमी उत्सव बहुत धूमधाम के साथ संपन्न किया। यह खास आयोजन संगठन के सौ वर्ष पूरे होने वाले शताब्दी समारोह के अंतिम वर्ष के रूप में मनाया गया है। इस बड़े कार्यक्रम के दौरान संघ के प्रमुख पदाधिकारी मोहन भागवत ने निर्धारित विधि-विधान के अनुसार शस्त्र पूजा की रस्म पूरी की और संगठन के संस्थापक केशव हेडगेवार को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में देश के पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और मुंबई शहर में इजराइल के कॉन्सुल जनरल ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और समारोह में शामिल हुए। कार्यक्रम स्थल पर भारी संख्या में स्वयंसेवक और गणमान्य लोग उपस्थित रहे। दूसरी ओर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस विशेष अवसर पर एक्स पर एक पोस्ट लिखकर देश के सभी नागरिकों को विजयादशमी पर्व की बधाई दी। प्रधानमंत्री ने अपनी शुभकामना संदेश में कामना की कि यह विशेष विजय पर्व हर नागरिक के जीवन में उल्लास लेकर आए और उनके संकल्पों को नई ताकत प्रदान करे।
संतों के योगदान और आत्म-जागरण पर भागवत का संबोधन
विजयादशमी के पावन पर्व पर उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने देश के कई महान संतों और उनके ऐतिहासिक योगदानों को विस्तार से याद किया। उन्होंने अपने संबोधन में संत रविदास, स्वामी श्रद्धानंद और स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के बलिदानों को रेखांकित किया। भागवत ने बताया कि जब देश पर विदेशी आक्रांताओं के हमले हो रहे थे और समाज में आतंक का माहौल था, तब संत रविदास ने लोगों को स्वधर्म निष्ठा और सामाजिक सद्भाव का मार्ग दिखाया। उन्होंने आर्य समाज के प्रसिद्ध शिक्षाविद और स्वतंत्रता सेनानी स्वामी शुद्धानंद के सर्वोच्च बलिदान के सौ साल पूरे होने का भी जिक्र किया। साथ ही ओडिशा क्षेत्र में आदिवासी समुदायों की सेवा करने वाले स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती महाराज की जन्म शताब्दी का भी उल्लेख किया। अपने भाषण के दौरान संघ प्रमुख ने पंच परिवर्तन के विषयों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इन परिवर्तनों में खुद को पहचानना और पूरी तरह से स्वदेशी को अपनाना सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। उन्होंने देश के संविधान की प्रस्तावना का हवाला देते हुए 'हम, भारत के लोग' वाक्यांश का जिक्र किया। उनके अनुसार संघ की स्थापना से लेकर अब तक के एक सौ वर्षों के सफर का मुख्य उद्देश्य देश के भीतर यही आत्म-जागरण और नैतिक पहचान पैदा करना रहा है।
राष्ट्रीय चरित्र निर्माण और संगठन का अंतिम लक्ष्य
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के इतिहास और उसके उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए मोहन भागवत ने संगठन की मूल विचारधारा को सबके सामने रखा। केशव हेडगेवार द्वारा वर्ष 1925 में विजयादशमी के ही शुभ दिन पर नागपुर शहर में इस संगठन की स्थापना की गई थी। तभी से यह संस्था लगातार हर वर्ष इस पावन त्योहार को मनाती आ रही है। संघ का मुख्य उद्देश्य हमेशा से देश के युवाओं में देशभक्ति की भावना भरना और एक मजबूत राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण करना रहा है। यह संगठन अपनी कार्यशैली के माध्यम से मातृभूमि के प्रति समर्पण, अनुशासन, साहस, वीरता और आत्म-संयम के गुणों को विकसित करने का प्रयास करता है। संघ का सबसे अंतिम और बड़ा लक्ष्य भारत देश का सर्वांगीण विकास करना है जिसके लिए संगठन से जुड़ा हर एक स्वयंसेवक अपना पूरा जीवन समर्पित करता है। पिछले साल शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में देश भर में विभिन्न प्रकार के कई कार्यक्रमों का आयोजन किया गया था। आज उन्हीं कार्यक्रमों के समापन के इस विशेष अवसर पर सभी लोग विजयादशमी मनाने के लिए एक साथ एकत्र हुए हैं। भागवत ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि भारत विभिन्नताओं से भरा हुआ देश है और इस विविधता को स्वीकार करना तथा इसकी रक्षा करना हमारा पारंपरिक और सनातन चरित्र रहा है।