भारतीय रणनीतिक हमलों और विशेष रूप से ब्रह्मोस मिसाइलों की सटीक एवं विनाशक मार ने पाकिस्तानी वायुसेना के इस सबसे महत्वपूर्ण और बड़े अड्डे को गंभीर रूप से झकझोर कर रख दिया था। ऑपरेशन सिंदूर के तहत की गई इस कार्रवाई में सरगोधा एयरबेस का बुनियादी ढांचा बुरी तरह ध्वस्त हो गया था, जिसके निशान आज भी पूरी तरह मिट नहीं पाए हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि घटना के 490 दिन गुजर जाने के बाद भी यहां आधुनिक उपकरणों और रनवे की बहाली के लिए मरम्मत का दौर लगातार जारी है। इस लंबे अंतराल तक काम का पूरा न होना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि भारतीय हमलों से हुआ नुकसान कितना व्यापक और गहरा था, जिसकी भरपाई करने में पाकिस्तानी प्रशासन को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
सामरिक विशेषज्ञों के अनुसार, सरगोधा एयरबेस पाकिस्तान की वायु रक्षा व्यवस्था का एक अत्यंत संवेदनशील और मुख्य केंद्र माना जाता है, जहां से देश के कई सामरिक अभियानों का संचालन किया जाता है। इतने महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने पर लंबे समय तक मरम्मत कार्य चलना इस बात की ओर इशारा करता है कि वहां की सैन्य व्यवस्था कितनी पस्त हो चुकी है और वित्तीय तथा तकनीकी संकट किस हद तक बढ़ गए हैं। इस एयरबेस के ठप पड़े रहने या आंशिक रूप से संचालित होने के कारण पाकिस्तानी वायुसेना की ऑपरेशनल क्षमताओं को गहरा आघात पहुंचा है, जिससे उनकी समग्र युद्धक तैयारियों पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा है। इस प्रकार की बड़ी तबाही के बाद बुनियादी ढांचे को पूर्ववत करना किसी भी देश के लिए चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन पाकिस्तान के मामले में प्रशासनिक सुस्ती और संसाधनों की भारी कमी ने इस प्रक्रिया को और अधिक लंबा खींच दिया है।
विश्लेषकों का मानना है कि इस सामरिक विफलता और एयरबेस की निरंतर हो रही मरम्मत से पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किरकिरी तो हो ही रही है, साथ ही उसकी सामरिक स्थिति भी काफी कमजोर हुई है। भविष्य में किसी भी संभावित संघर्ष की स्थिति में इस तरह के बुनियादी ढांचे का अधूरा होना पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बना रहेगा। जिस प्रकार भारत की सटीक मारक क्षमता ने इस एयरबेस को पंगु बना दिया, उसने क्षेत्रीय सामरिक समीकरणों को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है। आने वाले दिनों में जब तक यह एयरबेस पूरी क्षमता के साथ दोबारा चालू नहीं हो जाता, तब तक पाकिस्तानी वायुसेना को अपनी रणनीतिक योजनाओं में बड़े बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जो उनकी रक्षा प्रणाली की दीर्घकालिक कमजोरियों को उजागर करता है।