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युद्ध और जमीन: सैन्य जीत के पैमानों पर छिड़ी नई बहस

सेना प्रमुख के जमीन पर कब्जे को लेकर दिए गए बयान ने रक्षा विशेषज्ञों के बीच एक नई बहस को जन्म दिया है। यह चर्चा युद्ध के उद्देश्यों और भविष्य की सैन्य तैयारियों के इर्द-गिर्द केंद्रित है।

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Ankit Yadav
13 अक्ट 2026, 12:28
युद्ध और जमीन: सैन्य जीत के पैमानों पर छिड़ी नई बहस

जमीन पर कब्जे की सैन्य अहमियत

युद्ध में जीत को हमेशा हासिल की गई जमीन के पैमाने से मापा गया है और भविष्य में भी इसे एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाएगा। हाल ही में सेना प्रमुख ने एक व्याख्यान के दौरान कहा कि जीत का माप हमेशा ताकत के जोर से सुरक्षित की गई जमीन से ही किया जाता रहेगा। इस बयान ने रक्षा क्षेत्र में एक वैचारिक बहस शुरू कर दी है। कुछ विशेषज्ञों ने इसे अतिवादी माना है, जबकि अन्य इसे युद्ध के राजनीतिक लक्ष्यों से जोड़कर देख रहे हैं। पूर्व फाइटर पायलट अजय अहलावत ने तर्क दिया है कि 1965, 1971 और कारगिल जैसे युद्धों में जमीन पर स्थायी कब्जे के बिना भी सफलताएं मिली थीं। हालांकि, सैन्य दृष्टिकोण से जमीन पर नियंत्रण किसी भी अनुकूल परिणाम को हासिल करने की सबसे बड़ी क्षमता है। कारगिल की चोटियों को मुक्त कराना हो या 1971 में ढाका में पाकिस्तानी सेना का आत्मसमर्पण, इन सभी घटनाओं में जमीन पर सैन्य नियंत्रण ही अंतिम राजनीतिक नतीजे का आधार बना था। किसी भी युद्ध में जमीन को जीत का एकमात्र पैमाना न माना जाए, फिर भी यह सैन्य विजय का सबसे ठोस और स्पष्ट प्रमाण होता है जिसे नकारना कठिन है।

ऑपरेशन सिंदूर और सीमित युद्ध की चुनौतियां

वायुसेना के एयर चीफ मार्शल ए.पी। सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए हवाई शक्ति की अहमियत पर जोर दिया था। इस ऑपरेशन का उद्देश्य आतंकी ठिकानों को नष्ट करना और दुश्मन को नुकसान पहुंचाना था, जो कि सीमित राजनीतिक लक्ष्यों पर आधारित था। ऐसे अभियानों का मूल्यांकन जमीन जीतने के पैमाने पर करना गलत होगा, क्योंकि इनका स्वरूप पूरी तरह अलग होता है। जानबूझकर चलाए गए सीमित ऑपरेशन किसी देश के सैन्य विकल्पों का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन इनसे भविष्य के बड़े युद्धों की कल्पना करना एक गंभीर भूल हो सकती है। खाड़ी युद्ध, नागोर्नो-कराबाख संघर्ष और यूक्रेन-रूस युद्ध इसके ज्वलंत उदाहरण हैं, जहां तकनीक और ड्रोन के इस्तेमाल के बावजूद अंतिम सफलता जमीन पर नियंत्रण से ही तय हुई। यूक्रेन-रूस युद्ध में भी कोई भी समझौता इस बात पर निर्भर करेगा कि यूक्रेन अपनी कितनी खोई हुई जमीन को वापस पाने का दावा करता है। सीमित संघर्षों में सफलता का मतलब केवल दुश्मन को सजा देना या डर पैदा करना हो सकता है, लेकिन यह युद्ध में निर्णायक बढ़त हासिल करने का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकता है।

भविष्य की सैन्य तैयारी और रणनीतिक सोच

भारत के संदर्भ में भविष्य के युद्ध केवल सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि वे लंबे समय तक खिंच सकते हैं। सेना प्रमुख ने चेतावनी दी है कि संघर्ष 'विराम वाले युद्ध' में बदल सकते हैं, जिसके लिए भारत को लंबी तैयारी करनी होगी। जब यह मान लिया जाता है कि भविष्य के युद्ध केवल सटीक हमलों और तनाव बढ़ाने वाले होंगे, तो सेना का विकास भी उसी दिशा में होने लगता है। इससे लंबी दूरी तक मार करने वाले हथियारों और ड्रोन पर निवेश करना आसान लगता है, लेकिन लंबे जमीनी संघर्षों के लिए जरूरी क्षमताएं कमजोर पड़ सकती हैं। भारत की पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर विवादित भूगोल के कारण बड़े जमीनी युद्ध का जोखिम हमेशा बना रहता है। इसलिए, ऐसी संयुक्त सेना की आवश्यकता है जो सीमित संघर्षों के बड़े रूप लेने पर भी जमीन पर अपना नियंत्रण बनाए रख सके। सैन्य ढांचे, प्रशिक्षण और हथियारों की खरीद का मूल्यांकन इसी सहनशक्ति और जमीन पर पकड़ बनाए रखने की क्षमता के आधार पर किया जाना चाहिए। भविष्य की सैन्य चुनौतियां केवल तकनीक तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे विवादित सीमाओं पर तैनात सेना की समग्र शक्ति और उनके दीर्घकालिक युद्ध कौशल की परीक्षा लेने वाली हैं।

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