बाजार में बड़ी गिरावट और भारी नुकसान
भारतीय शेयर बाजार में 1 अक्टूबर को कारोबार के दौरान भारी बिकवाली का माहौल देखा गया। इस कारोबारी सत्र में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज यानी बीएसई का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स एक हजार से अधिक अंकों की भारी गिरावट के साथ नीचे फिसल गया। इसके साथ ही नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी सूचकांक भी बाईस हजार तीन सौ के स्तर से नीचे चला गया। इस तीव्र और अचानक आई मंदी के कारण बीएसई पर सूचीबद्ध सभी कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण कुछ ही घंटों के भीतर करीब नौ लाख करोड़ रुपये कम हो गया। हालांकि कारोबारी सत्र के अंतिम चरण तक आते-आते बाजार ने अपने कुछ शुरुआती नुकसान की भरपाई करने में सफलता प्राप्त कर ली। दिन का कारोबार समाप्त होने पर सेंसेक्स पांच सौ सत्तर दशमलव पांच नौ अंक लुढ़ककर इहत्तर हजार नौ सौ नौ दशमलव सात शून्य पर बंद हुआ। इसके अलावा निफ्टी भी एक सौ अट्ठानवे दशमलव पांच शून्य अंक टूटकर बाईस हजार चार सौ इक्कीस दशमलव नौ पांच के स्तर पर बंद हुआ। दोनों प्रमुख सूचकांकों में आई इस कमजोरी ने निवेशकों की चिंता को काफी बढ़ा दिया।
विदेशी निवेशकों की निकासी और वैश्विक कारण
घरेलू शेयर बाजार में उत्पन्न इस भारी दबाव के पीछे विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफआईआई की निरंतर बिकवाली मुख्य कारण रही। आंकड़ों के अनुसार तीस सितंबर को विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से लगभग दस हजार एक सौ अड़तालीस करोड़ रुपये की भारी निकासी की थी। इसके चलते सितंबर महीने के दौरान उनकी कुल बिकवाली का आंकड़ा बढ़कर लगभग चवालीस हजार तेरह करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इसके ठीक विपरीत घरेलू संस्थागत निवेशकों ने तीस सितंबर को बाजार में सक्रियता दिखाते हुए करीब ग्यारह हजार दो सौ बहत्तर करोड़ रुपये की खरीदारी की। इसके अलावा अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में हुई तीव्र वृद्धि का विपरीत असर भी भारतीय बाजार पर स्पष्ट रूप से पड़ा। अमेरिका की दस-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड बढ़कर पांच दशमलव तीन प्रतिशत से ऊपर जा पहुंची। इससे विदेशी निवेशकों के लिए अमेरिकी फिक्स्ड-इनकम निवेश ज्यादा आकर्षक बन गया और उन्होंने भारतीय बाजार से पूंजी निकाली। इसी दौरान भारतीय रुपया भी कमजोर होकर छियानवे रुपये प्रति डॉलर से नीचे चला गया और वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के दाम बढ़ने से बाजार पर दबाव और बढ़ गया।
पच्चीस वर्षों की सबसे लंबी साप्ताहिक गिरावट
भारतीय शेयर बाजारों के लिए यह मंदी केवल एक दिन की घटना तक सीमित नहीं रही बल्कि इसका दायरा काफी बड़ा है। दोनों प्रमुख शेयर सूचकांकों में लगातार आठवें सप्ताह गिरावट दर्ज की गई है। वित्तीय विश्लेषकों और बाजार विशेषज्ञों के अनुसार पिछले करीब पच्चीस वर्षों में यह सबसे लंबी साप्ताहिक गिरावट की श्रृंखला है। इस लंबी मंदी के दौर ने निवेशकों और बाजार के विश्लेषकों को गहरी चिंता में डाल दिया है। विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के कारण बाजार की यह चाल पिछले कई हफ्तों से कमजोर बनी हुई है। हालांकि घरेलू संस्थागत निवेशकों का समर्थन बाजार को कुछ हद तक सहारा दे रहा है लेकिन वैश्विक बॉन्ड यील्ड और मुद्रा की कमजोरी जैसी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर इन वैश्विक बदलावों का गहरा असर देखने को मिल रहा है। आने वाले दिनों में निवेशकों की नजरें विदेशी फंडों के प्रवाह और वैश्विक आर्थिक संकेतकों पर टिकी रहेंगी ताकि बाजार की अगली दिशा का अनुमान लगाया जा सके।