आयुर्वेद अस्पताल की लिफ्ट एक साल से ठप
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक प्रमुख आयुर्वेद अस्पताल में मरीजों की परेशानी का बड़ा कारण सामने आया है। यहां आने वाले मरीजों को पिछले बारह महीनों से लिफ्ट की सुविधा नहीं मिल पा रही है। अस्पताल की यह लिफ्ट लंबे समय से तकनीकी खराबी या रखरखाव की कमी के कारण बंद पड़ी है। इस स्थिति के चलते रोजाना आने वाले सामान्य नागरिकों और गंभीर रोगियों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। अस्पताल प्रशासन की इस लचर व्यवस्था के कारण मरीजों को अपनी बारी आने पर ऊपरी मंजिलों तक जाने के लिए केवल सीढ़ियों का ही एकमात्र विकल्प बचता है। लिफ्ट का संचालन बंद होने के बावजूद इसे ठीक कराने के लिए अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। इससे अस्पताल आने वाले लोगों में भारी रोष व्याप्त है और वे व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर रहे हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों में इस तरह की बुनियादी सुविधाओं का ठप होना बड़ी प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है। अस्पताल के भीतर इस समस्या के कारण तीमारदारों को भी अपने मरीजों को ऊपर ले जाने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है। कई बार बुजुर्ग और कमजोर मरीज सीढ़ियां चढ़ते वक्त बीच रास्ते में ही हांफने लगते हैं और उन्हें चक्कर तक आ जाते हैं। इसके बाद भी जिम्मेदार अधिकारी इस गंभीर विषय पर पूरी तरह से चुप्पी साधकर बैठे हुए हैं और किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे हैं।
गठिया रोगियों की बढ़ी मुश्किलें और सीढ़ियों का सफर
लखनऊ के इस आयुर्वेद अस्पताल में सबसे बुरा हाल गठिया और जोड़ों के दर्द से पीड़ित मरीजों का हो रहा है। गठिया के इन मरीजों के घुटनों में तेज दर्द होता है और उनके लिए जमीन पर चलना भी बेहद कठिन होता है। ऐसी स्थिति में इन मरीजों को मजबूरी में जान जोखिम में डालकर अस्पताल की कई सीढ़ियां चढ़नी पड़ रही हैं। सीढ़ियां चढ़ने के दौरान मरीजों के जोड़ों का दर्द और अधिक बढ़ जाता है जिससे उनकी तकलीफ कई गुना बढ़ जाती है। कई मरीज सीढ़ियों के सहारे ऊपर जाते वक्त बीच में ही सीढ़ियों पर बैठकर आराम करने को मजबूर हो जाते हैं। बुजुर्ग रोगियों के लिए यह स्थिति और भी अधिक कष्टदायक और पीड़ादायक साबित हो रही है क्योंकि वे बिना सहारे के चल नहीं सकते हैं। डॉक्टरों को दिखाने के लिए आने वाले इन मरीजों की सुध लेने वाला अस्पताल परिसर में कोई भी जिम्मेदार कर्मचारी नजर नहीं आता है। तीमारदार अपने मरीजों को सहारा देकर बड़ी मुश्किल से सीढ़ियों के जरिए डॉक्टर के कमरे तक पहुंचाते हैं। इस प्रक्रिया में कई बार मरीजों के गिरने और गंभीर रूप से चोटिल होने का खतरा भी लगातार बना रहता है। अस्पताल की यह व्यवस्था मरीजों के इलाज की बजाय उनकी तकलीफों को और अधिक बढ़ाने का काम कर रही है। मरीजों और उनके परिजनों ने कई बार इस बात की मौखिक शिकायत भी की है लेकिन किसी भी स्तर पर सुनवाई नहीं हो रही है। इस अमानवीय स्थिति के कारण लोगों को अपने स्वास्थ्य लाभ की बजाय अस्पताल में प्रवेश करते ही नई शारीरिक पीड़ा का सामना करना पड़ रहा है।
चिकित्सा संस्थानों में बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी का असर
सरकारी और अर्ध-सरकारी चिकित्सा संस्थानों में लिफ्ट जैसी बुनियादी सुविधाओं का महीनों तक बंद रहना मरीजों के मौलिक अधिकारों पर एक बड़ा प्रहार है। जब कोई मरीज इलाज की उम्मीद लेकर किसी अस्पताल की देहरी पर पहुंचता है तो वह वहां बेहतर और सुगम व्यवस्था की उम्मीद करता है। इसके विपरीत लखनऊ के इस आयुर्वेद अस्पताल की यह तस्वीर स्वास्थ्य सेवाओं के दावों की पोल खोलती नजर आती है। एक साल तक लिफ्ट का बंद रहना यह साबित करता है कि अस्पताल का रखरखाव विभाग अपने काम के प्रति कितना लापरवाह और उदासीन है। इस तरह की समस्याएं न केवल मरीजों के शारीरिक कष्ट को बढ़ाती हैं बल्कि चिकित्सा प्रणाली पर लोगों के अविश्वास को भी गहरा करती हैं। जानकारों का मानना है कि अस्पतालों में विकलांगों, बुजुर्गों और गंभीर रोगियों के लिए रैंप और लिफ्ट जैसी सुविधाएं अनिवार्य रूप से चालू हालत में होनी चाहिए। यदि समय रहते ऐसी तकनीकी कमियों को दूर नहीं किया गया तो किसी दिन बड़ा हादसा भी हो सकता है जिसके लिए पूरी तरह प्रशासन जिम्मेदार होगा। आने वाले दिनों में यदि इस लिफ्ट को ठीक नहीं किया गया तो आम जनता और मरीज कड़ा विरोध प्रदर्शन करने के लिए विवश हो सकते हैं। इस प्रकार की घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी और रख-रखाव के कार्यों में सुधार की बहुत अधिक आवश्यकता है। मरीजों को समय पर सही उपचार मिले इसके लिए यह जरूरी है कि अस्पताल परिसरों में लिफ्ट और पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं हमेशा निर्बाध रूप से चालू रहें ताकि किसी को भी किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।