महंगी हुई दवाएं और मरीजों पर बढ़ा आर्थिक संकट
देशभर के उन मरीजों की जेब पर भारी असर पड़ रहा है जिन्हें रोजाना या नियमित रूप से दवाएं खानी पड़ती हैं। गैस, उच्च रक्तचाप और दिल की गंभीर बीमारियों के इलाज में उपयोग होने वाली औषधियों के दाम अचानक काफी बढ़ गए हैं। लखनऊ केमिस्ट एसोसिएशन के हरीश चंद्र शाह ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया है कि बड़ी ब्रांडेड कंपनियों ने अपने उत्पादों के दाम बढ़ा दिए हैं। हालांकि राहत की बात यह है कि इस बढ़ोतरी के दौरान जेनरिक दवाओं के मूल्यों में किसी भी प्रकार का कोई इजाफा नहीं दर्ज किया गया है। लेकिन ब्रांडेड दवाएं महंगी होने की वजह से आम और गरीब मरीजों की जेब पर सीधा और बहुत बड़ा झटका लगा है। लगातार लंबे समय से उपचार करा रहे रोगियों के लिए हर महीने का दवा का खर्च उठाना अब काफी कठिन हो गया है। इन जीवनरक्षक और आवश्यक औषधियों के दाम बढ़ने के कारण परिवारों का घरेलू बजट पूरी तरह से डगमगा गया है और लोगों में इस बात को लेकर खासी चिंता देखी जा रही है कि आने वाले दिनों में वे अपना इलाज कैसे जारी रखेंगे।
कच्चे माल की किल्लत और आयात लागत में भारी वृद्धि
चिकित्सक विशेषज्ञों और जानकारों का कहना है कि अधिकांश एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट यानी कच्चे माल का मुख्य हिस्सा चीन से आयात किया जाता है। वर्तमान समय में दुनियाभर में चल रहे विभिन्न संघर्षों और तनावों के कारण माल ढोने वाले जहाजों और कंटेनरों की भारी कमी हो गई है। इस आपूर्ति संकट के चलते चीन और अन्य विदेशी बाजारों से मंगाए जाने वाले एपीआई की लागत में करीब 30 से 60 फीसदी तक की अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है। इसके अलावा कैंसर तथा अन्य गंभीर बीमारियों के निर्माण में उपयोग होने वाले प्लेटिनम और ग्लिसरीन जैसे महत्वपूर्ण साल्वेंट्स की वैश्विक कीमतें भी बढ़कर अपनी पिछली दर से दोगुनी से ज्यादा हो चुकी हैं। पिछले तीन महीनों के दौरान अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की विनिमय दर में लगातार गिरावट आई है। साथ ही माल ढुलाई और परिवहन का कुल खर्च भी 12 से 18 फीसदी तक बढ़ गया है। इन सभी मिले-जुले आर्थिक कारणों की वजह से दवा निर्माता कंपनियों की उत्पादन लागत में भारी उछाल आया है जिसके बाद कंपनियों ने मजबूर होकर बाजार में अपनी दवाओं के दाम बढ़ाए हैं।
भविष्य की आशंकाएं और अन्य दवाओं पर संभावित असर
बाजार के जानकारों और विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि यदि कच्चे माल और साल्वेंट्स की कीमतें इसी प्रकार लगातार बढ़ती रहीं तो आने वाले आगामी महीनों में अन्य श्रेणियों की दवाएं भी और अधिक महंगी हो सकती हैं। वर्तमान संकट का सबसे गंभीर प्रभाव उन रोगियों पर पड़ रहा है जिनकी दवाएं बिना रुके नियमित रूप से चलती हैं और जिन्हें हर हाल में अपनी चिकित्सीय खुराक जारी रखनी पड़ती है। वैश्विक स्तर पर परिवहन खर्चों का बढ़ना, कंटेनरों की किल्लत होना और विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी ने पूरे दवा क्षेत्र को संकट में डाल दिया है। इन तमाम परिस्थितियों के कारण दवा उद्योग से जुड़ी विनिर्माण इकाइयां भारी दबाव का सामना कर रही हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मालवाहक जहाजों की आवाजाही और आपूर्ति श्रृंखला सामान्य नहीं हुई तो आने वाले दिनों में आम जनता को और अधिक महंगाई का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल देश भर के केमिस्ट और मरीज इस बात को लेकर बेहद चिंतित हैं कि यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो जरूरी दवाओं की कीमतें और कितनी ऊपर चली जाएंगी।