अस्पतालों में दवाओं का गंभीर संकट
उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत आने वाले प्रमुख चिकित्सा संस्थानों में इस समय स्थिति काफी चिंताजनक बनी हुई है। एसएन अस्पताल और जिला अस्पताल परिसरों में डॉक्टर जब मरीजों की जांच करते हैं तो उन्हें पर्चे पर कई तरह की दवाएं लिख कर दी जाती हैं। लेकिन अस्पताल के भीतर बने दवा वितरण केंद्रों पर जरूरी दवाइयों का भारी टोटा चल रहा है। इसके चलते काउंटर पर पहुंचने वाले जरूरतमंद लोगों को मायूस होकर वापस लौटना पड़ रहा है। काउंटर पर तैनात कर्मचारी उन्हें साफ बता देते हैं कि यह दवा इस समय उनके स्टॉक में उपलब्ध नहीं है। ऐसे हालात में सामान्य और गरीब परिवारों के सामने अपने बीमार परिजनों का इलाज कराने का एक ही रास्ता बचता है कि वे बाहर से दवाएं खरीदें। सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं के भीतर ही जब मुफ्त दवाएं नहीं मिलती हैं तो आम नागरिकों को अपनी जेब से अतिरिक्त पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इस समस्या के कारण दूरदराज के ग्रामीण इलाकों से आने वाले गरीब मरीजों और उनके तीमारदारों को आर्थिक रूप से बहुत बड़ा झटका लग रहा है। कई बार तो लोगों के पास इतने पैसे भी नहीं होते हैं कि वे बाजार की महंगी कीमतों पर सभी दवाएं खरीद सकें।
मरीजों की जेब पर बढ़ रहा आर्थिक बोझ
दवाओं की इस अचानक पैदा हुई भारी किल्लत के कारण आम जनता की मुश्किलें हर गुजरते दिन के साथ लगातार बढ़ती ही जा रही हैं। जब सरकारी अस्पतालों के भीतर डॉक्टर की लिखी हुई दवाएं मुफ्त में नहीं मिलती हैं तो मरीजों को मजबूरन निजी मेडिकल स्टोरों का रुख करना पड़ता है। खुले बाजार में बिकने वाली दवाइयां काफी महंगी होती हैं और उन्हें खरीदने के लिए मरीजों को अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है। दिहाड़ी मजदूर और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोग इस स्थिति से सबसे ज्यादा बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। एक तरफ जहां वे अपनी बीमारी के इलाज के लिए अस्पताल की लंबी लाइनों में खड़े होकर संघर्ष करते हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्हें बाहर की दुकानों से महंगे दामों पर दवाएं खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है। स्थानीय निवासियों और अस्पताल आने वाले लोगों का कहना है कि प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को इस गंभीर समस्या की तरफ तुरंत ध्यान देना चाहिए। दवा वितरण केंद्रों पर समय पर पर्याप्त मात्रा में दवाइयों की आपूर्ति सुनिश्चित किया जाना बहुत जरूरी है ताकि किसी भी मरीज को बाहर से दवा खरीदने की विवशता का सामना न करना पड़े। लेकिन वर्तमान में जमीनी हकीकत यह है कि मरीजों को अपनी जेब ढीली करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है और उनका घरेलू बजट पूरी तरह से बिगड़ गया है।
स्वास्थ्य सेवाओं और व्यवस्था की पृष्ठभूमि
सरकारी अस्पतालों में आवश्यक औषधियों की उपलब्धता बनाए रखना स्वास्थ्य प्रशासन की एक बेहद बुनियादी और प्राथमिक जिम्मेदारी मानी जाती है। प्रदेशभर के विभिन्न जिलों में बने जिला अस्पतालों और बड़े चिकित्सा संस्थानों का मुख्य उद्देश्य यही होता है कि समाज के हर तबके के व्यक्ति को बिल्कुल मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधा मिल सके। इस व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए सरकार की ओर से हर साल बड़े पैमाने पर बजट आवंटित किया जाता है ताकि समय पर टेंडर प्रक्रिया पूरी करके दवाइयां खरीदी जा सकें। इसके बावजूद यदि एसएन अस्पताल और जिला अस्पताल जैसी महत्वपूर्ण जगहों पर दवाओं का टोटा हो जाता है तो यह पूरी आपूर्ति श्रृंखला की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। इस तरह के हालातों से न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता कम होती है बल्कि गरीब मरीजों का सरकारी तंत्र से भरोसा भी उठने लगता है। जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते दवा खरीद और वितरण की इस प्रक्रिया में सुधार नहीं किया गया तो स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है। सामान्य जनता यही उम्मीद करती है कि संबंधित विभाग के जिम्मेदार अधिकारी इस मामले का संज्ञान लेंगे और जल्द ही अस्पतालों में सभी जरूरी दवाइयों का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध कराएंगे।