तेज आवाज से स्वास्थ्य पर हो रहा बुरा असर गोरखपुर जिले में हाल के दिनों में विभिन्न आयोजनों के दौरान बजने वाले डीजे और लाउडस्पीकरों की कानफोड़ू आवाज लोगों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है। प्राप्त खबरों के अनुसार धार्मिक अनुष्ठानों या अन्य उत्सवों के समय तय मानकों की अनदेखी करते हुए अत्यधिक उच्च डेसिबल पर साउंड सिस्टम चलाए जा रहे हैं। इस निरंतर और अत्यधिक शोर के कारण स्थानीय नागरिकों को बहरेपन की शुरुआती समस्याओं, अत्यधिक मानसिक तनाव, सिरदर्द और चिड़चिड़ापन जैसी कई गंभीर स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। बुजुर्गों, छोटे बच्चों और पहले से ही किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए यह ध्वनि प्रदूषण और भी अधिक खतरनाक साबित हो रहा है, जिससे उनकी सेहत में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है और वे अस्पताल जाने को मजबूर हो रहे हैं।
ध्वनि प्रदूषण और इसके बढ़ते खतरे आधुनिक समय में डीजे और लाउडस्पीकर का बढ़ता उपयोग समाज में एक गंभीर समस्या का रूप लेता जा रहा है, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में। आमतौर पर यह देखा जाता है कि किसी भी प्रकार के उत्सव या धार्मिक आयोजन में लोग बिना इस बात की परवाह किए कि इससे आसपास के लोगों के जीवन पर क्या असर पड़ेगा, बहुत तेज आवाज में संगीत बजाते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों का यह मानना है कि लगातार नब्बे डेसिबल से अधिक की आवाज इंसानी कान की सुनने की क्षमता को स्थायी रूप से नुकसान पहुंचा सकती है। इसके अलावा हृदय गति का बढ़ना, रक्तचाप का असंतुलन और नींद पूरी न होने जैसी समस्याएं भी इसी अत्यधिक शोर के कारण उत्पन्न होती हैं। इस प्रकार की लापरवाहियों के चलते उत्सवों की खुशी कई बार आसपास रहने वाले सामान्य नागरिकों के लिए शारीरिक और मानसिक कष्ट का कारण बन जाती है, जिससे सामाजिक सौहार्द पर भी बुरा असर पड़ता है।
समस्या का समाधान और नागरिकों की चिंता इस प्रकार की गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से बचने के लिए यह जरूरी है कि प्रशासन और आम जनता दोनों मिलकर ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ कड़े कदम उठाएं। यदि समय रहते डीजे के इस अनियंत्रित शोर पर रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में इससे पीड़ित होने वाले लोगों की संख्या में और अधिक वृद्धि हो सकती है। स्थानीय स्तर पर लोगों का यह कहना है कि उत्सव मनाने का अधिकार सभी को है, लेकिन किसी को भी दूसरों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इस दिशा में संबंधित विभागों को नियमों का सख्ती से पालन कराना चाहिए और ध्वनि विस्तारक यंत्रों के उपयोग के लिए तय किए गए मानकों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ उचित कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए। तभी जाकर धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों की असली पवित्रता बनी रह सकेगी और आम नागरिकों को इस गंभीर बीमारी और मानसिक तनाव के संकट से मुक्ति मिल पाएगी।