आश्रय गृह के मालिकाना हक को लेकर विवाद
मुजफ्फरपुर स्थित श्रीकृष्ण मेमोरियल मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (एसकेएमसीएच) परिसर में मरीजों और उनके साथ आने वाले परिजनों के ठहरने के लिए एक आश्रय गृह का निर्माण किया गया था। वर्तमान में इस सुविधा के प्रबंधन और संचालन को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। होमी भाभा कैंसर अस्पताल के प्रशासन ने स्वास्थ्य विभाग के समक्ष इस आश्रय गृह को अपने नियंत्रण में लेने का औपचारिक प्रस्ताव रखा है। उनका तर्क है कि यहाँ रुकने वाले अधिकांश लोग कैंसर अस्पताल में इलाज कराने वाले मरीज और उनके तीमारदार होते हैं। दूसरी ओर, मेडिकल कॉलेज प्रशासन का अपना अलग पक्ष है। कॉलेज के अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि आश्रय गृह का निर्माण मूल रूप से उनके अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए किया गया था। इस प्रकार, दोनों संस्थान इस महत्वपूर्ण आवासीय सुविधा के संचालन का अधिकार अपने पास रखना चाहते हैं, जिससे स्वास्थ्य विभाग के सामने एक जटिल स्थिति उत्पन्न हो गई है।
स्वास्थ्य विभाग के साथ हुई उच्च स्तरीय बैठक
इस विवाद के समाधान के लिए स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने दोनों संस्थानों के प्रतिनिधियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की। यह चर्चा दो दिन पहले वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से संपन्न हुई थी, जिसमें दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क मजबूती से रखे। बैठक के दौरान होमी भाभा कैंसर अस्पताल के अधिकारियों ने विभाग को बताया कि चूंकि आश्रय गृह में रहने वालों की बड़ी संख्या कैंसर के रोगियों की है, इसलिए इसका प्रबंधन उनके हाथों में होना अधिक व्यावहारिक और तर्कसंगत होगा। इसके विपरीत, मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने अपनी पुरानी दलीलों को दोहराते हुए कहा कि यह सुविधा उनके अस्पताल के प्रांगण में स्थित है और मुख्य रूप से उनके मरीजों के लिए ही बनाई गई थी। दोनों संस्थानों द्वारा अपने दावों पर अड़े रहने के कारण, स्वास्थ्य विभाग के पदाधिकारी किसी भी पक्ष को तत्काल मंजूरी देने से बचते नजर आए। अभी तक इस पूरे मामले में विभाग की ओर से कोई आधिकारिक फैसला नहीं सुनाया गया है।
निर्णय का इंतजार और मरीजों की स्थिति
आश्रय गृह को लेकर चल रही यह खींचतान मरीजों और उनके परिजनों के भविष्य पर सीधा असर डालने वाली है। एसकेएमसीएच परिसर में स्थित यह आश्रय गृह गरीब मरीजों के लिए ठहरने का एक प्रमुख सहारा है, जो इलाज के दौरान बाहर रहने का खर्च उठाने में असमर्थ होते हैं। यदि प्रबंधन का जिम्मा कैंसर अस्पताल को मिलता है, तो वहां की कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। वहीं, मेडिकल कॉलेज के पास रहने से वहां के मरीजों की पहुंच पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह भी स्पष्ट नहीं है। स्वास्थ्य विभाग अब दोनों संस्थानों के दावों का सूक्ष्म विश्लेषण कर रहा है ताकि कोई ऐसा निर्णय लिया जा सके जिससे किसी भी मरीज को असुविधा न हो। विभाग के फैसले के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि आने वाले समय में इस आश्रय गृह का संचालन कौन सा संस्थान करेगा और वहां की व्यवस्था का स्वरूप क्या होगा। फिलहाल, पूरे मामले पर अंतिम निर्णय आना बाकी है और संबंधित संस्थान विभाग के अगले आदेश का इंतजार कर रहे हैं।