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स्वास्थ्य

मानसिक स्वास्थ्य चेतावनी: बिहार में डिमेंशिया का खतरा बढ़ा, आईजीआईएमएस की स्टडी में हुआ खुलासा

बिहार में बुजुर्गों के बीच भूलने की बीमारी यानी डिमेंशिया का प्रकोप लगातार गहराता जा रहा है। इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (आईजीआईएमएस) द्वारा किए गए एक अध्ययन से यह गंभीर तथ्य सामने आया है कि हर भूलने की घटना को केवल सामान्य बुढ़ापा नहीं माना जाना चाहिए।

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Ankit Yadav
21 सित 2026, 12:26
मानसिक स्वास्थ्य चेतावनी: बिहार में डिमेंशिया का खतरा बढ़ा, आईजीआईएमएस की स्टडी में हुआ खुलासा

आईजीआईएमएस की एक सौ मरीजों पर हुई विशेष स्टडी बिहार के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान यानी आईजीआईएमएस द्वारा हाल ही में एक सौ मरीजों पर केंद्रित विशेष अध्ययन का संचालन किया गया है जिसके निष्कर्ष बेहद चौंकाने वाले और चिंताजनक साबित हुए हैं। इस अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन बुजुर्गों में चीजें भूलने या पुरानी बातें याद न रख पाने के लक्षण दिखाई देते हैं, उनमें से कई लोग वास्तव में डिमेंशिया नामक गंभीर न्यूरोलॉजिकल विकार से पीड़ित होते हैं। आमतौर पर समाज में यह गलत धारणा गहराई तक बैठी हुई है कि बढ़ती उम्र के साथ याददाश्त का कमजोर होना एक स्वाभाविक और सामान्य प्रक्रिया है जिस पर किसी विशेष चिकित्सीय हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं होती है। परंतु इस हालिया शोध ने इस मिथक को पूरी तरह से खारिज कर दिया है और यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि उम्र ढलने के साथ होने वाली हर प्रकार की भूलने की समस्या को केवल बुढ़ापे का असर मानकर नजरअंदाज करना मरीजों के स्वास्थ्य के लिए भारी नुकसानदेह साबित हो सकता है।

सामान्य बुढ़ापे और भूलने की बीमारी का मुख्य अंतर चिकित्सकीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो सामान्य उम्रदराज होने की प्रक्रिया में व्यक्ति कभी-कभी छोटी-मोटी बातें या किसी का नाम क्षण भर के लिए भूल सकता है लेकिन बाद में उसे वह बात याद आ जाती है। इसके विपरीत डिमेंशिया एक ऐसी गंभीर चिकित्सीय स्थिति है जो धीरे-धीरे मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती है और व्यक्ति के दैनिक जीवन तथा उसकी सोचने-समझने की क्षमता को गहराई से प्रभावित करती है। बिहार जैसे विशाल राज्य में जहाँ स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर लगातार नए प्रयास किए जा रहे हैं, वहाँ इस प्रकार की मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति जनसामान्य में जागरूकता का भारी अभाव देखा जाता है। जब तक परिवार के लोग इस बीमारी के शुरुआती लक्षणों को पहचान पाते हैं, तब तक स्थिति काफी हद तक गंभीर हो चुकी होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि बुजुर्गों में व्यवहारगत बदलाव, भ्रम की स्थिति पैदा होना, और परिचित रास्तों या स्थानों पर खो जाना जैसे संकेत इस बात की तरफ स्पष्ट इशारा करते हैं कि मामला सामान्य बुढ़ापे का न होकर किसी गंभीर मानसिक विकार का हो सकता है जिस पर तुरंत ध्यान देना बेहद जरूरी हो जाता है।

संस्थान के खुलासे के बाद स्वास्थ्य क्षेत्र में नई चुनौतियाँ इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान के इस महत्वपूर्ण खुलासे के बाद से राज्य के स्वास्थ्य महकमे और चिकित्सकों के बीच इस बात को लेकर गंभीर चर्चा शुरू हो गई है कि आने वाले समय में न्यूरोलॉजिकल विकारों से निपटने के लिए किस तरह की पुख्ता रणनीतियाँ तैयार की जानी चाहिए। इस प्रकार के अध्ययनों का मुख्य उद्देश्य न केवल चिकित्सा जगत को बल्कि आम जनता को भी सचेत करना होता है ताकि लोग समय रहते अपने बुजुर्ग परिजनों के स्वास्थ्य की नियमित जाँच करवा सकें। आने वाले दिनों में यह जरूरी हो गया है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला स्तर के अस्पतालों तक मानसिक स्वास्थ्य और स्मृतिलोप से जुड़ी बीमारियों के प्रति परामर्श और निदान की बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। यदि शुरुआती स्तर पर ही डिमेंशिया के लक्षणों की पहचान कर ली जाए तो उचित चिकित्सा, खानपान और उचित देखभाल के माध्यम से मरीजों के जीवन की गुणवत्ता में काफी हद तक सुधार लाया जा सकता है और परिवारों पर पड़ने वाले मानसिक तथा सामाजिक दबाव को भी कम किया जा सकता है।

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