डिप्रेशन के मामलों में लगातार वृद्धि
आजमगढ़ जिले में मानसिक रोगियों की संख्या में लगातार इजाफा दर्ज किया जा रहा है। अत्यधिक तनाव और जीवनशैली की समस्याओं के कारण डिप्रेशन के शिकार लोगों की तादाद बढ़ रही है। इस स्थिति से जूझने वाले मरीजों को समय पर सही मार्गदर्शन नहीं मिल पा रहा है। ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में इस गंभीर मानसिक समस्या के लक्षण तेजी से उभर रहे हैं। परिवार के लोग भी शुरुआती दौर में इन लक्षणों को समझ नहीं पाते हैं। जब तक समस्या विकराल रूप लेती है तब तक मरीज की स्थिति काफी बिगड़ चुकी होती है। डॉक्टरों के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता की भारी कमी इस बढ़ोतरी का एक बड़ा कारण है। लोग अक्सर मानसिक समस्याओं को छिपाने की कोशिश करते हैं। इससे रोग अंदर ही अंदर और अधिक गंभीर हो जाता है। प्रभावित व्यक्तियों के दैनिक जीवन पर इसका बहुत बुरा असर पड़ता है।
उपचार सुविधाओं का गंभीर अभाव
मानसिक रोगों की चपेट में आ रहे मरीजों को स्थानीय स्तर पर जरूरी चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पा रही है। आजमगढ़ के अस्पतालों में मनोचिकित्सकों और विशेष काउंसलिंग केंद्रों की भारी कमी बनी हुई है। इलाज के अभाव में मरीजों की तकलीफें दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। परिजनों को अपने मरीजों को लेकर दूसरे बड़े शहरों के अस्पतालों की तरफ दौड़ना पड़ता है। कई बार आर्थिक तंगी के कारण गरीब परिवार महंगे निजी अस्पतालों का खर्च नहीं उठा पाते हैं। इससे मरीजों को समय पर दवा और उचित परामर्श नहीं मिल पाता है। सरकारी स्वास्थ्य तंत्र में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढ़ होना बेहद आवश्यक है। जब तक हर जिले में प्रशिक्षित डॉक्टर और दवाइयां उपलब्ध नहीं होंगी तब तक हालात में सुधार मुश्किल है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को इस दिशा में तुरंत ठोस कदम उठाने की जरूरत है। मरीजों की बढ़ती तादाद के अनुपात में चिकित्सा संसाधनों को बढ़ाना अब अनिवार्य हो गया है।
मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक पृष्ठभूमि
मानसिक स्वास्थ्य का विषय समाज में लंबे समय से उपेक्षित रहा है जिसके कारण आज संकट गहराता जा रहा है। डिप्रेशन को केवल एक सामान्य उदासी समझ लेना सबसे बड़ी भूल साबित हो रही है। यह एक गंभीर चिकित्सीय स्थिति है जिसे समय पर नियंत्रित करना बेहद जरूरी होता है। यदि शुरुआत में ही इसका सही उपचार मिल जाए तो मरीज पूरी तरह से स्वस्थ हो सकता है। सामाजिक कलंक के डर से लोग डॉक्टर के पास जाने से कतराते हैं जो स्थिति को और भी अधिक बदतर बना देता है। जागरूकता अभियानों के अभाव में लोग मानसिक रोगों के लक्षणों को पहचान नहीं पाते हैं। आने वाले समय में यदि इस दिशा में ध्यान नहीं दिया गया तो स्थिति और अधिक भयावह हो सकती है। सरकार और स्वास्थ्य संगठनों को मिलकर गांव-गांव तक मानसिक स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन करना चाहिए। आम जनता को यह समझना होगा कि शारीरिक बीमारी की तरह मानसिक बीमारी का इलाज भी संभव है।