अध्ययन में किशोरों पर मोबाइल के दुष्प्रभावों का खुलासा रांची स्थित केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान यानी रिनपास द्वारा किए गए ताजा शोध में यह बात सामने आई है कि आधुनिक तकनीक और स्मार्टफोन की अत्यधिक लत किशोर उम्र के बच्चों को उनके पारिवारिक परिवेश तथा सामाजिक जीवन से तेजी से दूर करती जा रही है। इस विशेष अध्ययन के दायरे में आए युवा और किशोर लगातार स्क्रीन के सामने अधिक समय बिता रहे हैं जिसके कारण उनकी दैनिक दिनचर्या पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो चुकी है। शोध के दौरान यह प्रमुखता से देखा गया कि डिजिटल उपकरणों के लगातार उपयोग से बच्चों के सोने के चक्र पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है और वे अनिद्रा जैसी गंभीर समस्याओं का सामना कर रहे हैं। इसके साथ ही उनकी पठन-पाठन की आदतों और स्कूल के प्रदर्शन में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है क्योंकि उनका ध्यान पढ़ाई से पूरी तरह भटक चुका है। अध्ययन के आंकड़ों के अनुसार जरूरत से ज्यादा मोबाइल देखने वाले किशोरों के स्वभाव में आक्रामक बदलाव और सामाजिक मेलजोल में कमी साफ तौर पर देखी जा रही है जो माता-पिता के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बनता जा रहा है।
रिनपास के शोध और सामाजिक परिवेश की पृष्ठभूमि आज के डिजिटल युग में जिस तरह से स्मार्टफोन और इंटरनेट हर घर की पहुंच में आ चुका है उसने बच्चों के पालन-पोषण और उनके मानसिक विकास के सामने एक नई और गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। रिनपास जैसे प्रतिष्ठित संस्थान इस प्रकार के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक विषयों पर लगातार नजर रखते हैं ताकि समय रहते समाज को इन खतरों से आगाह किया जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना महामारी के बाद से ऑनलाइन शिक्षा और मनोरंजन के नाम पर बच्चों के हाथों में जो उपकरण थमाए गए थे वे अब उनकी आदत बन चुके हैं। परिवार के सदस्य अक्सर व्यस्तता के कारण बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते हैं जिसके चलते ये किशोर अपनी हर तन्हाई और खाली समय को मोबाइल स्क्रीन के हवाले कर देते हैं। इस स्थिति के कारण पारिवारिक संवाद की वह पुरानी संस्कृति लगातार कमजोर हो रही है जिसमें बैठकर आपस में बातचीत की जाती थी। समाजशास्त्री और मनोचिकित्सक यह मानते हैं किशोरावस्था एक ऐसा संवेदनशील पड़ाव होता है जहां बच्चे का मानसिक ढांचा तैयार होता है और ऐसे में गैजेट्स की यह वर्चुअल दुनिया उन्हें वास्तविक मानवीय रिश्तों तथा भावनाओं से दूर ले जाकर एक काल्पनिक और अकेली दुनिया में धकेल रही है।
भविष्य की चिंता और माता-पिता की बड़ी जिम्मेदारी इस अध्ययन के सामने आने के बाद अब यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि अभिभावक और शिक्षण संस्थान मिलकर इस बढ़ती हुई समस्या के खिलाफ समय रहते ठोस कदम उठाएं। यदि किशोरों की इस डिजिटल लत पर जल्द ही नियंत्रण नहीं पाया गया तो आने वाले समय में युवा पीढ़ी के मानसिक स्वास्थ्य और बौद्धिक विकास को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है। मनोचिकित्सकों का यह सुझाव है कि माता-पिता को अपने बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना चाहिए और घर में एक ऐसा माहौल तैयार करना चाहिए जहां स्क्रीन टाइम को एक निश्चित सीमा के भीतर रखा जा सके। स्कूलों और कॉलेजों में भी इस विषय पर विशेष जागरूकता अभियान चलाए जाने की आवश्यकता है ताकि विद्यार्थियों को यह समझाया जा सके कि तकनीक का उपयोग एक साधन के रूप में होना चाहिए न कि उनके जीवन के नियंत्रण के रूप में। आने वाले दिनों में इस तरह के शोध नीति निर्माताओं और स्वास्थ्य विभागों को बच्चों के मानसिक कल्याण के लिए नए नियम या दिशा-निर्देश बनाने में मदद करेंगे ताकि समाज की इस अमूल्य धरोहर को डिजिटल दुनिया के दुष्प्रभावों से सुरक्षित रखा जा सके।