दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, नशा मुक्त भारत अभियान को जमीनी स्तर पर अत्यंत प्रभावी और सफल बनाने के लिए आम जनता की सक्रिय भागीदारी को अनिवार्य रूप से जोड़े जाने पर विशेष जोर दिया गया है। आधुनिक समय में नशीली पदार्थों के सेवन के बढ़ते चलन और इसके दुष्प्रभावों से युवा पीढ़ी को बचाने के वास्ते यह कदम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अधिकारियों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि जब तक समाज का प्रत्येक वर्ग इस अभियान से सीधे तौर पर नहीं जुड़ेगा, तब तक इसका अपेक्षित परिणाम हासिल करना कठिन होगा। इसी उद्देश्य के तहत देश के विभिन्न हिस्सों में जनजागरूकता रैलियों, नुक्कड़ नाटकों और शैक्षिक संस्थानों में विशेष कार्यक्रमों के जरिए लोगों को इस मुहिम से जोड़ने की रूपरेखा तैयार की जा रही है ताकि नशे के खिलाफ एक मजबूत सामाजिक ताना-बाना बुना जा सके।
इस व्यापक अभियान की पृष्ठभूमि पर गौर करें तो भारत सरकार और विभिन्न राज्यों के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा पिछले कुछ वर्षों से नशीली दवाओं के दुरुपयोग के खिलाफ निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। खासकर शिक्षण संस्थानों के आसपास के इलाकों, दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी बस्तियों में तस्करों के जाल को तोड़ने के लिए खुफिया तंत्र को मजबूत करने के साथ-साथ परामर्श केंद्रों की संख्या में भी लगातार इजाफा किया गया है। अतीत के अनुभवों से यह स्पष्ट हुआ है कि केवल पुलिस या प्रशासनिक कार्रवाई से इस समस्या पर पूरी तरह काबू नहीं पाया जा सकता है, क्योंकि इसमें सामाजिक संवेदनशीलता और मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग की भी उतनी ही आवश्यकता होती है। यही वजह है कि मौजूदा समय में नीति निर्माताओं ने इस राष्ट्रीय समस्या के समाधान के लिए सामुदायिक सहभागिता यानी पब्लिक पार्टनरशिप को सबसे मुख्य केंद्रबिंदु बनाया है, जिसके तहत स्थानीय युवाओं, महिलाओं और सामुदायिक नेताओं को आगे आने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
आने वाले दिनों में इस रणनीति के दूरगामी सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं, क्योंकि जनभागीदारी बढ़ने से न केवल सूचना तंत्र मजबूत होगा बल्कि सामाजिक स्तर पर नशे के आदि हो चुके लोगों को मुख्यधारा में लौटने के लिए एक सहानुभूतिपूर्ण और सुरक्षित वातावरण भी मिलेगा। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि पंचायतों, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों और युवा मंडलों को इस अभियान का हिस्सा बना लिया जाए, तो दूर-दराज के गांवों तक इसका सीधा संदेश पहुंचेगा और तस्करों के हौसले पस्त होंगे। इसके अलावा, स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षकों तथा अभिभावकों की संयुक्त समितियों के गठन से बच्चों में शुरुआती स्तर पर ही काउंसलिंग और मॉनिटरिंग करना आसान हो जाएगा। इस पूरी कवायद का अंतिम लक्ष्य देश की युवा शक्ति को इस गंभीर सामाजिक अभिशाप से सुरक्षित रखना है ताकि राष्ट्र निर्माण में उनकी ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग किया जा सके।