निजी अस्पतालों में दवाओं की अवैध बिक्री
लखनऊ जिले के भीतर संचालित होने वाले कई निजी चिकित्सा संस्थानों में नियमों का उल्लंघन करके दवाइयों का व्यापार किया जा रहा है। इस प्रकार की गतिविधियों के कारण मरीजों को उचित और पारदर्शी स्वास्थ्य लाभ मिलने में बाधा उत्पन्न हो रही है। स्वास्थ्य विभाग के निर्धारित प्रावधानों के अनुसार किसी भी अस्पताल परिसर में चिकित्सीय सामग्री और औषधियों के वितरण के लिए विशेष लाइसेंस और तय मानकों का होना अनिवार्य होता है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कई स्थानों पर इन नियमों की अनदेखी किए जाने की बात प्रकाश में आई है। स्थानीय स्तर पर प्राप्त जानकारियों के अनुसार इन संस्थानों में बिना उचित अनुमति के दवा काउंटर संचालित किए जा रहे हैं। मरीजों को बाहर से दवा मंगाने के बजाय सीधे अस्पताल के भीतर बने परिसरों से ही दवाइयां खरीदने के लिए प्रेरित या बाध्य किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में न तो गुणवत्ता का पूरा ध्यान रखा जाता है और न ही प्रशासन द्वारा तय किए गए मूल्य मानकों का पालन किया जाता है।
प्रशासनिक नियमों और प्रावधानों की अनदेखी
चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था से मरीजों का आर्थिक शोषण होने की पूरी संभावना बनी रहती है। नियमों के मुताबिक निजी अस्पतालों को अपने यहां फार्मेसी चलाने के लिए राज्य औषधि विभाग से आधिकारिक अनुमति लेनी होती है। साथ ही प्रशिक्षित फार्मासिस्ट की मौजूदगी भी हर समय अनिवार्य की गई है ताकि मरीजों को सही खुराक और सही दवा मिल सके। लेकिन कई निजी संस्थानों में इन बुनियादी आवश्यकताओं को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया है। बिना फार्मासिस्ट के ही दवाइयों का लेन-देन किया जा रहा है जो सीधे तौर पर स्वास्थ्य सुरक्षा नियमों का गंभीर उल्लंघन है। इसके अलावा दवाओं के रखरखाव के लिए जरूरी तापमान और अन्य भंडारण संबंधी मानकों की भी अनदेखी की जाती है। इस लापरवाही के कारण कई बार मरीजों को घटिया या अनुचित तरीके से रखी गई दवाइयां मिल जाती हैं। आम जनता इस प्रकार के मामलों में अनभिज्ञ रहती है और अस्पताल प्रबंधन की मनमानी का शिकार बन जाती है।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर प्रभाव और सुधार की आवश्यकता
इस प्रकार की अनियमितताओं का सीधा असर आम नागरिकों के स्वास्थ्य और जेब दोनों पर पड़ता है। जब तक स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े इन संस्थानों पर कड़ी नजर नहीं रखी जाएगी तब तक इस तरह की गतिविधियां रुकने का नाम नहीं लेंगी। चिकित्सा क्षेत्र में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि जिला प्रशासन और संबंधित स्वास्थ्य अधिकारी समय-समय पर औचक निरीक्षण करें। नियमों का उल्लंघन करने वाले अस्पतालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके। मरीजों और उनके तीमारदारों को भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना चाहिए ताकि वे किसी भी प्रकार के अवैध व्यापार का हिस्सा बनने से बच सकें। इस पूरी स्थिति से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग को एक मजबूत निगरानी तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है। आने वाले दिनों में यदि इन मामलों पर लगाम नहीं कसी गई तो स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है जिसके लिए संबंधित विभागों को ठोस कदम उठाने होंगे।