केजीएमयू से निजी अस्पताल में मरीज भेजने का मामला उत्तर प्रदेश की चिकित्सा राजधानी कहे जाने वाले लखनऊ स्थित किंग जर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के भीतर से एक गंभीर रूप से बीमार मरीज को नियमानुसार सरकारी संस्थान में रखने के बजाय सीधे किसी निजी चिकित्सालय में भिजवाए जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया था। इस गंभीर घटना के प्रकाश में आने के बाद से ही विभिन्न स्तरों पर इसकी गहन आंतरिक जांच शुरू की गई थी ताकि यह स्पष्ट हो सके कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान किन-किन चिकित्सकीय कर्मचारियों या बाहरी दलालों की संलिप्तता थी। हालांकि इतनी संवेदनशीलता वाले इस प्रकरण के सामने आने के बावजूद संबंधित उच्चाधिकारियों और प्रशासनिक कमेटियों की तरफ से अब तक किसी भी प्रकार की ठोस या निर्णायक कार्रवाई अमल में नहीं लाई जा सकी है जिससे यह पूरा मामला फाइलों के बीच ही कहीं दबकर रह गया है। इस प्रकार की घटनाओं से सीधे तौर पर सरकारी चिकित्सा संस्थानों की छवि धूमिल होती है और आम गरीब जनता का उन बड़े अस्पतालों से विश्वास उठने लगता है जो न्यूनतम लागत पर बेहतरीन इलाज देने का दावा करते हैं।
चिकित्सा संस्थानों में दलाल संस्कृति और प्रशासनिक लापरवाही देशभर के बड़े सरकारी अस्पतालों में मरीजों को बहला-फुसलाकर उन्हें महंगे निजी अस्पतालों या नर्सिंग होम तक पहुंचाने का अवैध कारोबार लंबे समय से एक गंभीर समस्या बना हुआ है। अक्सर देखने में आता है कि कुछ असामाजिक तत्व और दलाल किस्म के लोग सरकारी परिसरों के आसपास सक्रिय रहकर तीमारदारों की मजबूरी का फायदा उठाते हैं और उन्हें बेहतर इलाज का झूठा लालच देकर प्राइवेट सेंटरों की तरफ मोड़ देते हैं। इस पूरे नेक्सस में कभी-कभी निचले स्तर के स्वास्थ्य कर्मियों की मिलीभगत की बात भी सामने आती है जो कमीशनखोरी के चक्कर में इस तरह के गैरकानूनी कृत्यों को बढ़ावा देते हैं। जब कभी ऐसे मामलों की पोल खुलती है और प्रशासनिक स्तर पर जांच बिठाई जाती है, तो शुरुआती दौर में तो बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं परंतु बाद में विभागीय सुस्ती और लालफीताशाही के चलते दोषियों पर शिकंजा कसने के बजाय मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। यही कारण है कि आज भी किंग जर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में इस तरह की गतिविधियां पूरी तरह से रुकने का नाम नहीं ले रही हैं और प्रशासनिक अमला केवल खानापूरी करने तक ही सीमित नजर आता है।
कार्रवाई में हो रही देरी पर उठते सवाल और भविष्य की राह मरीज को निजी अस्पताल में शिफ्ट करने जैसे संवेदनशील प्रकरण में अब तक कोई ठोस दंडनात्मक कदम न उठाए जाने से आम जनता और स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों के बीच गहरी नाराजगी देखने को मिल रही है। जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते ऐसे मामलों में लिप्त लोगों के खिलाफ सख्त मिसाली कार्रवाई नहीं की गई, तो इस प्रकार के अवैध कारनामों को बढ़ावा देने वालों के हौसले और अधिक बुलंद हो जाएंगे। भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर पूर्ण विराम लगाने के लिए यह अति आवश्यक है कि राज्य सरकार और चिकित्सा संस्थान के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी आपसी समन्वय बनाकर एक पारदर्शी निगरानी तंत्र विकसित करें। इस तंत्र के माध्यम से न केवल अस्पताल परिसर में घूमने वाले संदिग्ध लोगों की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी जा सकेगी बल्कि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी पाए जाने पर तुरंत प्रभाव से बिना किसी लीपापोती के कानूनी शिकंजा कसा जा सकेगा। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि क्या उच्चाधिकारी इस मामले का संज्ञान लेते हुए दोषियों को बेनकाब करते हैं या फिर यह फाइल हमेशा के लिए बंद कर दी जाती है।