खरोंच और चाटने से संक्रमण का खतरा विश्व रेबीज दिवस के मौके पर चिकित्सा जगत की ओर से यह आम जनता को आगाह किया जा रहा है कि कुत्ते के केवल दांत गड़ाने से ही नहीं, बल्कि उसके हल्के से खरोंच मारने या त्वचा को चाटने से भी रेबीज का घातक विषाणु शरीर के भीतर दाखिल हो सकता है। आमतौर पर लोगों में यह बहुत बड़ी गलतफहमी पाई जाती है कि जब तक खून न निकले या गहरा घाव न हो जाए, तब तक एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगवाने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। वास्तविकता यह है कि यदि किसी संक्रमित कुत्ते की लार आपकी किसी पुरानी खरोंच, कटी-फटी त्वचा या शरीर के संवेदनशील अंगों जैसे आंख, नाक या मुंह के संपर्क में आ जाती है, तो वायरस के नसों के रास्ते सीधे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तक पहुंचने का खतरा समान रूप से बना रहता है। चिकित्सा विज्ञान इस बात की पुष्टि करता है कि आवारा कुत्तों या अन्य रेबीज वाहક पशुओं के नाखूनों में अक्सर लार लगी होती है क्योंकि वे अपने शरीर को चाटते रहते हैं, इसलिए खरोंच लगना भी उतना ही जोखिम भरा है जितना कि दांतों से काटा जाना, और इस तरह की लापरवाही कभी-कभी बहुत भारी पड़ सकती है।
जानलेवा बीमारी और बरती जाने वाली सावधानियां रेबीज एक ऐसी लाइलाज और अत्यधिक खतरनाक बीमारी है जिसके लक्षण एक बार प्रकट हो जाने के बाद मरीज को बचा पाना लगभग असंभव हो जाता है और यह शत-प्रतिशत घातक साबित होती है। इस गंभीर जनस्वास्थ्य समस्या से निपटने के लिए भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन दोनों ही लगातार जागरूकता अभियान चलाते हैं ताकि आम नागरिक पशुओं के काटने या खरोंचने के तुरंत बाद उठाए जाने वाले शुरुआती कदमों के प्रति पूरी तरह से जागरूक हो सकें। किसी भी पालतू या आवारा पशु द्वारा खरोंचे जाने की स्थिति में सबसे पहले उस प्रभावित हिस्से को बहते हुए साफ पानी और साबुन से कम से कम पंद्रह मिनट तक अच्छी तरह धोना चाहिए ताकि वायरस की सक्रियता को काफी हद तक कम किया जा सके। इसके बाद बिना किसी अनावश्यक विलंब के किसी नजदीकी सरकारी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र पर जाकर डॉक्टर की सलाह के अनुसार एंटी-रेबीज टीकाकरण का पूरा कोर्स समय पर पूरा करना ही एकमात्र वैज्ञानिक उपाय है जो इस जानलेवा संक्रमण से पूरी सुरक्षा सुनिश्चित करता है और किसी भी प्रकार के जोखिम को टालने में मदद करता है।
सामुदायिक स्तर पर बचाव और आगे की राह समाज में रेबीज के मामलों को पूरी तरह से शून्य पर लाने के लिए केवल व्यक्तिगत सतर्कता ही नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर सामुदायिक सहभागिता और प्रशासनिक स्तर पर सख्त कदम उठाए जाने की बेहद आवश्यकता है। नगर निगमों और स्थानीय निकायों द्वारा आवारा कुत्तों की व्यापक टीकाकरण और नसबंदी योजनाएं चलाई जानी चाहिए ताकि पशुओं में इस वायरस के फैलने की चेन को समय रहते तोड़ा जा सके और इंसानों तक इसका खतरा न पहुंचे। इसके अलावा पशुपालकों की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने पालतू कुत्तों और बिल्लियों को समय पर एंटी-रेबीज के टीके जरूर लगवाएं ताकि घर के सदस्यों के साथ-साथ आस-पड़ोस के लोग भी सुरक्षित रह सकें। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का यह स्पष्ट मानना है कि यदि लोग अंधविश्वासों या घरेलू नुस्खों पर भरोसा करने के बजाय तुरंत चिकित्सा सहायता लेने की सही आदत डाल लें, तो भारत को रेबीज मुक्त बनाने का सपना बहुत जल्द साकार किया जा सकता है और इस भयानक बीमारी से होने वाली अकाल मौतों के आंकड़ों को प्रभावी ढंग से शून्य तक पहुंचाया जा सकता है।