शरीर को अंदर से खोखला करती हैं ये बीमारियां आधुनिक जीवनशैली की रफ्तार इतनी तेज हो चुकी है कि लोग अक्सर अपने शरीर के छोटे-छोटे संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं और यही लापरवाही बाद में गंभीर बीमारियों का रूप ले लेती है। उच्च रक्तचाप और मधुमेह को चिकित्सा जगत में अक्सर साइलेंट किलर कहा जाता है क्योंकि शुरुआती चरणों में इनके लक्षण आसानी से समझ में नहीं आते हैं और यह धीमे-धीमे इंसान के अंदरूनी अंगों को नुकसान पहुंचाते रहते हैं। जब तक व्यक्ति को इन गंभीर समस्याओं के बारे में पता चलता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है और हृदय, किडनी तथा आंखों जैसे महत्वपूर्ण अंग अपनी कार्यक्षमता खोने लगते हैं। डॉक्टरों का यह स्पष्ट रूप से मानना है कि यदि समय रहते इन बीमारियों की पहचान कर ली जाए और नियमित रूप से रक्त शर्करा तथा ब्लड प्रेशर की जांच कराई जाए, तो इस आंतरिक क्षति को काफी हद तक रोका जा सकता है। वर्तमान समय में भागदौड़ भरी जिंदगी, मानसिक तनाव, अत्यधिक फास्ट फूड का सेवन और शारीरिक श्रम की कमी इन दोनों बीमारियों के फैलने के सबसे बड़े कारण बनते जा रहे हैं।
समय पर जांच और लक्षणों की पहचान का महत्व किसी भी गंभीर स्वास्थ्य समस्या से निपटने के लिए सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम उसकी शुरुआती अवस्था में ही पहचान करना होता है, जिसे चिकित्सा विज्ञान में अर्ली डायग्नोसिस कहा जाता है। मधुमेह और उच्च रक्तचाप के मामले में यह बात सौ फीसदी सच साबित होती है क्योंकि यदि इनके शुरुआती लक्षणों को पहचान लिया जाए तो दवाइयों और जीवनशैली में बदलाव करके इन्हें आसानी से नियंत्रण में रखा जा सकता है। नियमित मेडिकल चेकअप के दौरान ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर की निगरानी करने से यह पता चल जाता है कि शरीर में क्या बदलाव हो रहे हैं और क्या कोई खतरा मंडरा रहा है। अक्सर लोग डॉक्टर के पास तभी जाते हैं जब कोई बड़ी स्वास्थ्य आपात स्थिति सामने आ जाती है, जो कि बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। चिकित्सा विशेषज्ञों का सुझाव है कि एक निश्चित उम्र के बाद हर व्यक्ति को साल में कम से कम दो बार अपने रक्तचाप और शुगर के स्तर की जांच जरूर करवानी चाहिए ताकि किसी भी संभावित खतरे को समय रहते ही थामा जा सके और शरीर को बड़े नुकसान से बचाया जा सके।
बचाव के उपाय और भविष्य की कार्ययोजना इन गंभीर बीमारियों के प्रकोप से बचने के लिए केवल दवाइयों पर निर्भर रहना काफी नहीं होता है, बल्कि अपनी दिनचर्या में सकारात्मक बदलाव लाना सबसे ज्यादा जरूरी होता है। संतुलित आहार का सेवन करना, नियमित रूप से योग, व्यायाम या वॉक करना और मानसिक तनाव से दूर रहना इन दोनों ही समस्याओं से बचाव का सबसे अचूक नुस्खा माना गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय और विभिन्न चिकित्सा संगठनों द्वारा समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं ताकि आम जनता को इन बीमारियों के खतरों और उनके समय पर निदान के बारे में शिक्षित किया जा सके। भविष्य में यदि इन बीमारियों के बढ़ते मामलों पर लगाम लगानी है तो समाज के हर वर्ग को अपनी सेहत के प्रति जागरूक होना पड़ेगा और प्रिवेंटिव हेल्थकेयर को अपनी जीवनशैली का मुख्य हिस्सा बनाना होगा। सरकार और स्वास्थ्य संस्थानों को मिलकर ऐसे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में विशेष शिविर लगाने चाहिए जहां लोग जागरूकता के अभाव में नियमित जांच नहीं करवा पाते हैं, ताकि हर नागरिक एक स्वस्थ और सुरक्षित जीवन जी सके।