मानव संपदा पोर्टल पर उजागर हुआ मामला
मानव संपदा पोर्टल पर दर्ज किए गए आधिकारिक रिकॉर्ड से यह बात सामने आई है कि अंबेडकरनगर जिले के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक यानी सीएमएस डॉ परमानंद यादव करीब चौदह वर्ष से लगातार एक ही अस्पताल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इसी तरह भदोही के सीएमएस डॉ रामराज और इटावा के सीएमएस डॉ पारितोष शुक्ला भी लगभग तेरह-तेरह वर्षों से एक ही चिकित्सा संस्थान में जमे हुए हैं। प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत जिला स्तर के अस्पतालों में कुल एक सौ सात पद सीएमएस के लिए स्वीकृत किए गए हैं। इसके अलावा संयुक्त चिकित्सा अस्पतालों में भी तैंतीस पद इसी श्रेणी के लिए निर्धारित किए गए हैं। इन सभी महत्वपूर्ण पदों पर लेवल चार के वरिष्ठ अधिकारियों की तैनाती की जाती है। इन अधिकारियों की नियुक्ति और स्थानांतरण की पूरी प्रक्रिया शासन स्तर से ही संचालित की जाती है और ये सभी अधिकारी आनलाइन स्थानांतरण प्रणाली के दायरे से पूरी तरह बाहर रखे गए हैं। पोर्टल पर इनकी तैनाती की अवधि स्पष्ट रूप से दर्ज होने के बावजूद तीन साल की निर्धारित सीमा समाप्त होने के बाद भी उनका अन्यत्र तबादला नहीं किया गया है।
स्थानांतरण नीति के नियमों की हो रही है अनदेखी
उत्तर प्रदेश सरकार की मौजूदा स्थानांतरण नीति के स्पष्ट निर्देश हैं कि कोई भी अधिकारी एक जिले में तीन वर्ष से अधिक समय तक तैनात नहीं रह सकता है। इस नीति के अनुसार एक ही मंडल के भीतर भी सात वर्ष से अधिक की तैनाती पर पूरी तरह रोक लगाई गई है। इसके बावजूद इन तीनों सीएमएस अधिकारियों की वर्तमान तैनाती की कुल अवधि तय की गई सीमा से चार गुना से भी ज्यादा हो चुकी है। इतने लंबे समय तक एक ही स्थान पर जमे रहने के कारण लेवल चार के अधिकारियों के तबादलों की पूरी व्यवस्था और विभाग द्वारा नीति के पालन पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। स्वास्थ्य विभाग के भीतर प्रशासनिक व्यवस्था और पारदर्शिता को लेकर विभिन्न हलकों में चर्चा शुरू हो गई है। जब तीन साल की तय सीमा पूरी होने के बाद भी इन अधिकारियों के तबादले नहीं किए जाने को लेकर सवाल उठाए गए, तो इस पर स्वास्थ्य विभाग के महानिदेशक डॉ पवन कुमार अरुण ने अपना बयान दिया। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक प्रणाली में जो विसंगतियां इस समय सामने आई हैं, उन सभी की पूरी जानकारी शासन को भेज दी गई है ताकि उच्च स्तर पर आवश्यक कदम उठाए जा सकें।
शासन स्तर पर भेजी गई विसंगतियों की रिपोर्ट
स्वास्थ्य विभाग के भीतर तय मानकों और नियमों की इस प्रकार की अनदेखी से विभागीय कार्यप्रणाली पर कई तरह के प्रश्न चिह्न लग रहे हैं। नीतिगत प्रावधानों के मुताबिक अधिकारियों का समय पर फेरबदल होना आवश्यक माना जाता है ताकि प्रशासनिक कसावट बनी रहे। लेकिन इसके विपरीत कई जिलों में अधिकारी एक ही स्थान पर दशक से अधिक समय बिता चुके हैं। इस स्थिति के कारण विभागीय व्यवस्था की निगरानी करने वाले अधिकारियों और शासन के बीच पत्राचार भी शुरू हो चुका है। महानिदेशक स्तर से इस मामले की तथ्यात्मक जानकारी शासन को सौंपे जाने के बाद अब आगे की प्रशासनिक कार्रवाई का इंतजार किया जा रहा है। आम नागरिकों और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोगों के लिए यह स्थिति प्रशासनिक पारदर्शिता की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पोर्टल पर रिकॉर्ड दर्ज होने के बावजूद समय पर कार्रवाई न होने की वजह से व्यवस्था की मैदानी हकीकत खुलकर सामने आ गई है। अब यह देखना होगा कि शासन स्तर से इन मामलों में क्या निर्णय लिया जाता है और नियमों का पालन करवाने के लिए विभाग किस प्रकार की ठोस और प्रभावी नीतिगत कदम उठाता है।