सरकारी अस्पतालों में बदहाली और सुविधाओं का अभाव
देशभर में स्वास्थ्य सेवाएं आम आदमी की पहुंच से दूर होती जा रही हैं। राजधानी दिल्ली के प्रमुख सरकारी संस्थानों में बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है। जीटीबी अस्पताल में एक मरीज की जान पंखा गिरने से चली गई, जो वहां की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। लोक नायक जयप्रकाश अस्पताल में एमआरआई जांच के लिए मरीजों को दिसम्बर 2028 तक का इंतजार करना पड़ रहा है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स में भी कई प्रकार की सर्जरी के लिए पांच साल तक की वेटिंग चल रही है। मरीजों को अस्पताल के भीतर ही स्ट्रेचर, दस्ताने और जरूरी दवाएं बाहर से खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है। राज्यों के हालात इससे भी बदतर हैं। छत्तीसगढ़ के नौ जिला अस्पतालों में आईसीयू की सुविधा उपलब्ध नहीं है, जबकि 12 अस्पतालों में सीटी स्कैन मशीनें नहीं हैं। सरकारी अस्पतालों की यह दयनीय स्थिति आम नागरिकों के लिए स्वास्थ्य के संवैधानिक अधिकारों पर एक बड़ा प्रहार है।
निजी क्षेत्र की मनमानी और सरकारी योजनाओं की विफलता
सरकारी अस्पतालों के मुकाबले निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च 5 से 10 गुना तक अधिक है। संसदीय समिति की अगस्त 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना 2017 के तहत जीडीपी का 2.5 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च होना चाहिए था, लेकिन वर्तमान में केवल 1.43 प्रतिशत का ही बजटीय आवंटन हो रहा है। इसके कारण 70 प्रतिशत आबादी को ही बीमा योजनाओं का लाभ मिल पा रहा है, जबकि शेष 40 करोड़ लोग 'मिसिंग मिडिल' की श्रेणी में आते हैं। कॉर्पोरेट अस्पताल, जो अक्सर सरकारी जमीन पर संचालित होते हैं, गरीब मरीजों के उपचार में आनाकानी करते हैं। 11 साल की लंबी जांच के बाद प्रतिस्पर्धा आयोग ने दिल्ली के 12 अस्पतालों को क्लीनचिट दे दी। सरकार ने जन विश्वास कानून 2026 के माध्यम से स्वास्थ्य से जुड़े 35 कानूनों को अनापराधिक बना दिया है। सुप्रीम कोर्ट की चिंता के बावजूद, कैंसर की 2700 रुपये वाली दवा 27000 रुपये में बेची जा रही है और 2013 के ड्रग्स आदेश का पालन नहीं हो रहा है।
डिजिटल निगरानी और इलाज का बढ़ता आर्थिक संकट
इलाज के बढ़ते खर्च से करोड़ों लोगों का कर्ज में डूबना एक मानवीय त्रासदी के रूप में उभर रहा है। स्वास्थ्य के विषय में राज्यों की भूमिका होने के बावजूद, केंद्र सरकार अब मरीजों का डेटा डिजिटल रूप से एकत्रित कर रही है। यूनिफाइड पैन इंडिया रजिस्ट्रेशन पोर्टल से लेकर आरोग्य सेतु-2 ऐप तक, डॉक्टरों, फार्मासिस्टों और मरीजों का विस्तृत रिकॉर्ड क्लाउड आधारित सूचनाओं में दर्ज किया जा रहा है। केमिस्ट दुकानों में सीसीटीवी लगाने के आदेश से डॉक्टर के पर्चे और दवाइयों की जानकारी भी डिजिटल निगरानी के दायरे में है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के 1996 के फैसले के अनुसार सरकार की जिम्मेदारी अच्छी चिकित्सा व्यवस्था देने की है, लेकिन गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के बजाय शहरों में अस्पतालों की ग्रेडिंग पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। 2010 के कानून और 2012 के नियमों के तहत अस्पतालों में रेट तय करने के फरवरी 2024 के निर्देशों पर भी अभी तक केवल राज्यों के साथ परामर्श ही चल रहा है।