पिथौरागढ़ में चिकित्सा सेवाओं का हाल
उत्तराखंड के पर्वतीय जिले पिथौरागढ़ में स्वास्थ्य ढांचे को लेकर एक बहुत बड़ी और गंभीर खबर सामने आई है। यहाँ की लगभग तीन लाख महिला आबादी के इलाज का पूरा दारोमदार महज़ दो विशेषज्ञों के कंधों पर है। इतनी बड़ी संख्या में महिला मरीजों के लिए केवल दो ही डॉक्टरों का उपलब्ध होना स्वास्थ्य विभाग की बड़ी नाकामी को दर्शाता है। पर्वतीय क्षेत्रों में वैसे ही स्वास्थ्य सुविधाओं का भारी अभाव रहता है और ऐसे में महिला विशेषज्ञों की इतनी कम संख्या स्थिति को और अधिक भयावह बना देती है। गर्भवती महिलाओं और अन्य गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों को समय पर सही इलाज मिलना इन हालातों में लगभग असंभव सा हो जाता है। जिले के दूरदराज के गाँवों से आने वाली महिलाओं को डॉक्टर न मिलने के कारण मायूस होकर वापस लौटना पड़ता है। स्थानीय जिला अस्पताल और अन्य सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों के कई पद लंबे समय से खाली पड़े हुए हैं। इसके बावजूद शासन और प्रशासन स्तर पर इन रिक्त पदों को भरने के लिए कोई ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। अस्पताल पहुँचने वाली हर महिला मरीज को घंटों अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है क्योंकि डॉक्टरों पर काम का अत्यधिक बोझ रहता है। इस गंभीर समस्या के कारण आम जनता में भारी रोष व्याप्त है और वे लगातार स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की माँग कर रहे हैं।
महिला मरीजों की बढ़ती मुश्किलें और संकट
विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी के कारण पिथौरागढ़ जिले की महिलाओं को हर रोज अनगिनत मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। आपातकालीन स्थिति में जब गर्भवती महिलाओं को तुरंत चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता होती है तब भी उन्हें दर-दर भटकना पड़ता है। जिले में केवल दो विशेषज्ञ होने के कारण वे हर मरीज को पर्याप्त समय नहीं दे पाते हैं जिससे इलाज की गुणवत्ता पर भी बुरा असर पड़ता है। कई बार गंभीर मामलों में मरीजों को बेहतर इलाज के लिए हल्द्वानी या बरेली जैसे बड़े शहरों के लिए रेफर कर दिया जाता है। पहाड़ी रास्तों और लंबी दूरी के सफर के दौरान कई बार मरीज की हालत और अधिक बिगड़ जाती है जिससे कभी-कभी जान का भी खतरा पैदा हो जाता है। गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए बाहर जाकर निजी अस्पतालों में इलाज करवाना आर्थिक रूप से बेहद कठिन होता है। वे लोग सरकारी अस्पतालों पर ही पूरी तरह निर्भर रहते हैं लेकिन वहाँ भी डॉक्टरों का टोटा उनकी परेशानियों को और बढ़ा देता है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी इस समस्या से भली-भांति परिचित हैं फिर भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। महिला स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में ऐसी लापरवाही किसी भी सभ्य समाज और मजबूत व्यवस्था के लिए एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है। आम जनता और विभिन्न सामाजिक संगठन लगातार सरकार से मांग कर रहे हैं कि जल्द से जल्द पर्वतीय जिलों में डॉक्टरों के खाली पदों को भरा जाए।
पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य व्यवस्था की पृष्ठभूमि
भारत के पहाड़ी और पर्वतीय राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली कोई नई बात नहीं है बल्कि यह एक पुरानी और गंभीर समस्या रही है। सुदूर पहाड़ी इलाकों में डॉक्टरों का न जाना और वहाँ तैनात होने के बाद भी लंबी छुट्टियों पर रहना आम बात बन चुकी है। पिथौरागढ़ का यह ताज़ा मामला इस बात का प्रमाण है कि ग्रामीण और पर्वतीय अंचलों में स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा कितना कमजोर और लचर हो चुका है। सरकारें स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने के लिए तमाम बड़े-बड़े दावे और वादे करती हैं लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों से कोसों दूर नजर आती है। जब तक पर्वतीय क्षेत्रों में काम करने वाले डॉक्टरों को विशेष प्रोत्साहन भत्ते और बेहतर आवासीय सुविधाएँ नहीं दी जाएँगी तब तक इस स्थिति में सुधार की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है। महिला स्वास्थ्य जैसे अतिसंवेदनशील मुद्दे पर इस तरह की उदासीनता भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकती है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के चलते मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर बढ़ने का खतरा भी हमेशा बना रहता है। आने वाले समय में यदि सरकार ने इस दिशा में कोई कड़े कदम नहीं उठाए तो जनता का सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था से पूरी तरह विश्वास उठ जाएगा। इस प्रकार की खबरें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि देश के दूरदराज के कोनों में बैठा आम नागरिक आज भी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए कितना संघर्ष कर रहा है।