बिल्हौर में ठप हुई स्वास्थ्य सेवाएं
कानपुर नगर जिले के बिल्हौर ब्लॉक में ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। अरौल थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत बकोठी और बेर्राखानपुर में स्थित आयुष्मान आरोग्य मंदिरों पर पिछले 15 दिनों से ताले लगे हुए हैं। इन केंद्रों को संचालित करने वाले सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी यानी सीएचओ अपनी मांगों को लेकर लखनऊ में आंदोलन कर रहे हैं। इस हड़ताल के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक उपचार की सुविधा पूरी तरह से बंद हो गई है। स्थानीय निवासियों को अब सामान्य बीमारियों के इलाज के लिए भी दूर-दराज के अस्पतालों की ओर दौड़ लगानी पड़ रही है। इन आरोग्य मंदिरों का मुख्य उद्देश्य ग्रामीणों को उनके घर के पास ही बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना था, लेकिन वर्तमान स्थिति ने इस उद्देश्य को विफल कर दिया है। केंद्रों के बंद होने से गांव के लोगों में असंतोष व्याप्त है क्योंकि उन्हें स्वास्थ्य संबंधी सलाह और दवाइयों के लिए भटकना पड़ रहा है।
सीएचओ की मांगें और आंदोलन का ब्यौरा
सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों का यह विरोध प्रदर्शन लखनऊ में पिछले 15 दिनों से निरंतर जारी है। सीएचओ संगठन की ओर से शासन के समक्ष कई महत्वपूर्ण मांगें रखी गई हैं, जिनमें सेवा संबंधी जटिलताओं का त्वरित समाधान करना शामिल है। वे अपने लिए एक स्पष्ट कैडर के निर्माण और नियमितीकरण की प्रक्रिया को पूरा करने की मांग कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, परफॉर्मेंस बेस्ड इंसेंटिव यानी पीबीआई को उनके मासिक वेतन का हिस्सा बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है। आयुष्मान भारत हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर के निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार समान वेतन की मांग भी इस आंदोलन का एक प्रमुख हिस्सा है। संगठन के पदाधिकारी शासन स्तर से सकारात्मक निर्णय लिए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं ताकि वे अपनी सेवाएं फिर से शुरू कर सकें। हालांकि, जब तक शासन और सीएचओ के बीच कोई ठोस सहमति नहीं बनती, तब तक इन केंद्रों के खुलने की संभावना कम ही दिखाई दे रही है।
ग्रामीणों की परेशानी और भविष्य की चुनौतियां
आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के बंद होने से सबसे अधिक प्रभावित बुजुर्ग, महिलाएं और छोटे बच्चे हो रहे हैं। बुखार, खांसी और जुकाम जैसी मौसमी बीमारियों के लिए भी ग्रामीणों को अब अन्य स्वास्थ्य केंद्रों या निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है। इस प्रक्रिया में ग्रामीणों का कीमती समय और पैसा दोनों ही बर्बाद हो रहे हैं। इन केंद्रों की स्थापना का मूल लक्ष्य ही यह था कि ग्रामीणों को प्राथमिक उपचार के लिए लंबी दूरी तय न करनी पड़े, लेकिन हड़ताल के कारण यह सुविधा फिलहाल कागजों तक ही सीमित रह गई है। ग्रामीण अब इन केंद्रों के दोबारा खुलने और वहां नियमित स्वास्थ्य सेवाएं बहाल होने की बाट जोह रहे हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए यह आवश्यक है कि सीएचओ की मांगों का जल्द समाधान निकाला जाए ताकि आम जनता को और अधिक परेशानी न झेलनी पड़े। प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।