विश्व रेबीज दिवस के मौके पर विभिन्न स्वास्थ्य संगठनों और संस्थानों द्वारा समाज के हर वर्ग तक रेबीज जैसी घातक बीमारी के खिलाफ जागरूकता पहुंचाने का बीड़ा उठाया गया। इस विशेष अभियान के तहत डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने जनता को यह समझाया कि किस प्रकार एक आवारा पशु के काटने या खरोंचने मात्र से यह वायरस मनुष्य के तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर सकता है और समय पर इलाज न मिलने पर यह जानलेवा साबित हो सकता है। कार्यक्रमों के दौरान मुख्य रूप से इस बात पर जोर दिया गया कि कैसे लोग अपने पालतू और आवारा जानवरों का समय पर टीकाकरण करवाकर इस गंभीर संक्रमण के जोखिम को पूरी तरह से टाल सकते हैं। विशेषज्ञों ने नुक्कड़ नाटक, सेमिनार और पंपलेट वितरण के माध्यम से लोगों को यह भी बताया कि पशुओं के काटने की स्थिति में तुरंत प्राथमिक उपचार क्या होना चाहिए और एंटी-रेबीज इंजेक्शन की पूरी खुराक लेना क्यों अनिवार्य है।
रेबीज एक ऐसा जूनोटिक वायरस है जो मुख्य रूप से संक्रमित कुत्तों, बिल्लियों और अन्य जंगली जानवरों की लार से इंसानों में फैलता है। दुनिया भर में हर साल हजारों लोग इस बीमारी की चपेट में आते हैं, जिनमें से अधिकांश मामले ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों से होते हैं जहां आवारा पशुओं की संख्या अधिक होती है और टीकाकरण की पहुंच सीमित होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसियां लंबे समय से यह मानती आई हैं कि रेबीज शत-प्रतिशत रोकथाम योग्य बीमारी है, बशर्ते समय रहते उचित कदम उठाए जाएं। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए हर साल यह दिवस मनाया जाता है ताकि सरकारों, स्वास्थ्य कर्मियों और आम नागरिकों को इस बात की याद दिलाई जा सके कि सामूहिक प्रयासों से ही इस बीमारी को पूरी तरह से समाप्त किया जा सकता है। भारत जैसे घनी आबादी वाले देशों में, जहां आवारा कुत्तों की एक बड़ी संख्या मौजूद है, वहां इस तरह के सामुदायिक जागरूकता अभियान न केवल लोगों को सतर्क करते हैं बल्कि अंधविश्वास और गलत इलाजों से दूर रखकर वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति की ओर प्रेरित भी करते हैं।
आने वाले समय में इस प्रकार के अभियानों को और अधिक व्यापक बनाने की आवश्यकता है ताकि जमीनी स्तर पर हर नागरिक तक रेबीज से जुड़ी सही जानकारी पहुंच सके। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि केवल एक दिन के कार्यक्रमों से पूरी तरह बदलाव नहीं लाया जा सकता, इसलिए साल भर स्कूलों, कॉलेजों और स्थानीय समुदायों में टीकाकरण शिविर और कार्यशालाएं आयोजित की जानी चाहिए। इसके साथ ही, स्थानीय प्रशासन को भी आवारा पशुओं के नसबंदी और टीकाकरण कार्यक्रमों में तेजी लानी होगी ताकि संक्रमण की श्रृंखला को जड़ से तोड़ा जा सके। यदि नागरिकों में जागरूकता बढ़ेगी और समय पर एंटी-रेबीज वैक्सीन उपलब्ध कराई जाएगी, तो इस घातक बीमारी के कारण होने वाली मौतों के आंकड़ों को शून्य पर लाया जा सकता है। यह अभियान भविष्य में एक सुरक्षित और स्वस्थ समाज की स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा, बशर्ते इसे निरंतरता और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के साथ लागू किया जाए।