गांडेय में आंदोलनकारियों का शक्ति प्रदर्शन
झारखंड राज्य निर्माण आंदोलन में अपनी अहम भूमिका निभाने वाले चिन्हित आंदोलनकारियों ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया। यह कार्यक्रम गांडेय प्रखंड की करीबांक पंचायत के ओझाडीह गांव में आयोजित किया गया था। इस बैठक में गांडेय और बेंगाबाद के अलावा जामताड़ा जिले के कई अलग-अलग प्रखंडों से पहुंचे आंदोलनकारियों ने हिस्सा लिया। बड़ी संख्या में जुटे इन लोगों ने राज्य के प्रति अपने संघर्षों को याद किया और वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त की। बैठक में उपस्थित लोगों ने एक सुर में अपनी मांगों को सरकार के समक्ष मजबूती से रखने का संकल्प लिया। मुख्य रूप से इस आयोजन का उद्देश्य आंदोलनकारियों को मिलने वाली सुविधाओं और उनके उचित सम्मान को सुनिश्चित करना था। क्षेत्र के कई वरिष्ठ आंदोलनकारियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए शासन प्रणाली पर सवाल उठाए। बैठक के दौरान हॉलधर राय सहित आसपास के कई क्षेत्रों से आए आंदोलनकारी मौजूद थे जिन्होंने इस एकजुटता को और अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास किया है।
पेंशन और सरकारी नौकरियों की मांग
बैठक में सम्मिलित आंदोलनकारियों ने सरकार से अपनी उपेक्षा पर गहरा असंतोष जाहिर करते हुए कई मांग पत्र सौंपने की बात कही। वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि राज्य गठन के संघर्ष में जो सम्मान मिलना चाहिए था, वह अभी तक उन्हें प्राप्त नहीं हो सका है। उनकी प्रमुख मांगों में आंदोलनकारियों के लिए उच्च पेंशन का प्रावधान करना शामिल है। इसके अलावा उन्होंने मांग की कि हर आंदोलनकारी के परिवार को कम से कम एक सरकारी नौकरी अवश्य दी जानी चाहिए। स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर चर्चा करते हुए सदस्यों ने कहा कि सरकार को सभी आंदोलनकारियों के लिए बीमा सुविधाएं अनिवार्य रूप से लागू करनी चाहिए। अपनी बात रखते हुए शिवा जी मुर्मू ने स्पष्ट किया कि क्षेत्र में अभी भी कई ऐसे आदिवासी आंदोलनकारी शेष हैं जिनके नाम सरकारी सूची से छूट गए हैं। उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया है कि इन छूटे हुए नामों को शीघ्र जोड़कर सभी पात्र लोगों को लाभ प्रदान किया जाना चाहिए ताकि वे भी इस योजना का हिस्सा बन सकें।
विधायिका की कार्यशैली और आदिवासी समस्या
जॉन मुर्मू ने बैठक के दौरान गांडेय की विधायिका की कार्यशैली पर कड़ा प्रहार करते हुए आदिवासियों के प्रति अनदेखी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि विधायक द्वारा आदिवासी गांवों का दौरा नहीं करने के कारण स्थानीय समस्याओं का समाधान नहीं निकल पा रहा है। आदिवासियों की कठिनाइयों को समझने के लिए जन प्रतिनिधियों का सीधे गांवों में जाकर उनसे मिलना अत्यंत आवश्यक है। इस बैठक में मौजूद सभी लोगों ने इस बात पर जोर दिया कि केवल दावों से काम नहीं चलेगा, बल्कि धरातल पर बदलाव लाना जरूरी है। आंदोलनकारियों का मानना है कि यदि प्रशासन और जनप्रतिनिधि समय रहते उनकी मांगों पर विचार नहीं करते हैं तो भविष्य में संघर्ष को और अधिक तीव्र किया जा सकता है। वर्तमान में वे अपनी मांगों को लेकर सरकार के सकारात्मक निर्णय का इंतजार कर रहे हैं। राज्य निर्माण में अपना जीवन खपाने वाले ये लोग अब अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए निरंतर सक्रिय रहने की रणनीति तैयार कर रहे हैं ताकि सरकार उनकी उपेक्षा न कर सके।