उपकेंद्रों पर घटती संख्या और बढ़ती उपभोक्ता आबादी
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के विभिन्न बिजली उपकेंद्रों पर तैनात तकनीकी कर्मचारियों की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। एक तरफ जहां महानगर में बिजली उपभोक्ताओं का दायरा हर साल तेजी से बढ़ रहा है और नए कनेक्शन लगातार जोड़े जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मैदानी स्तर पर काम करने वाले बिजलीकर्मियों के रिक्त पदों को समय पर नहीं भरा जा रहा है। स्थिति यह हो गई है कि सीमित अमले के कंधों पर पूरे क्षेत्र की विद्युत आपूर्ति संभालने का अत्यधिक दबाव आ गया है। इस असंतुलन के कारण उपकेंद्रों का दैनिक कामकाज बुरी तरह प्रभावित हो रहा है और मैदानी अमले को बिना पर्याप्त विश्राम के लंबे समय तक काम करना पड़ रहा है। विभागीय जानकारों का मानना है कि कर्मचारियों और उपभोक्ताओं की संख्या के बीच का यह बढ़ता हुआ अंतर आने वाले समय में बिजली व्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती साबित हो सकता है। आम जनता को निर्बाध बिजली देने के दावे करने वाले महकमे के भीतर की यह हकीकत व्यवस्था की पोल खोलती नजर आती है। स्थानीय स्तर पर विद्युत आपूर्ति बनाए रखने वाले इन केंद्रों पर अमले की कमी का सीधा असर तकनीकी सेवाओं की गुणवत्ता पर भी पड़ रहा है।
अनुभव की कमी और तकनीकी खामियों से बढ़ते हादसे
लखनऊ के इन बिजली उपकेंद्रों पर कुशल और अनुभवी हाथों की भारी कमी साफ तौर पर देखी जा सकती है। वरिष्ठ एवं अनुभवी तकनीकी कर्मचारियों के सेवानिवृत्त होने या अन्य कारणों से हटने के बाद उनकी जगह पूरी तरह प्रशिक्षित और दक्ष लोगों को तुरंत तैनात नहीं किया जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप लाइनों की मरम्मत और रख-रखाव जैसे बेहद जोखिम भरे कामों के लिए नए या कम अनुभवी कर्मियों को आगे होना पड़ता है। अनुभवहीनता के कारण जरा सी चूक बड़े हादसों को न्योता दे देती है, जिससे काम कर रहे कर्मियों की जान पर भी संकट बन आता है। बिजली लाइनों पर काम करते समय सुरक्षा मानकों का पालन कराने वाले प्रशिक्षित संरक्षकों की कमी के कारण आए दिन दुर्घटनाओं की खबरें सामने आती हैं। उपकेंद्रों पर तकनीकी खराबी आने पर उसे तुरंत और सुरक्षित तरीके से ठीक करने वाले दक्ष विशेषज्ञों का टोटा बना हुआ है। कभी-कभी साधारण सी तकनीकी गड़बड़ी को सुधारने के दौरान भी अनुभव की कमी के चलते भारी नुकसान उठाना पड़ जाता है। इस प्रकार की घटनाओं से न केवल बिजली विभाग की साख पर बट्टा लगता है बल्कि मैदानी कर्मचारियों में असुरक्षा की भावना भी लगातार बढ़ती जा रही है।
विद्युत प्रणाली की पृष्ठभूमि और इस संकट का महत्व
किसी भी बड़े शहर की बिजली आपूर्ति प्रणाली का सुचारू रूप से चलना प्रशिक्षित मानव संसाधन की उपलब्धता पर पूरी तरह निर्भर करता है। आधुनिक शहरीकरण और तेजी से बढ़ते औद्योगिक तथा आवासीय क्षेत्रों के बीच बिजली ग्रिड का रख-रखाव बेहद जटिल कार्य माना जाता है। ऐसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे में यदि प्रशिक्षित इंजीनियरों और लाइनमैनों की भारी कमी हो जाए, तो पूरी व्यवस्था चरमराने लगती है। लखनऊ जैसे घनी आबादी वाले महानगर में उपकेंद्रों की भूमिका अत्यंत संवेदनशील होती है क्योंकि यहां छोटी सी लापरवाही हजारों घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की बत्ती गुल कर सकती है। इस प्रकार की खबरें हमारे नीति निर्माताओं और संबंधित महकमों के लिए एक बड़ी चेतावनी का काम करती हैं ताकि समय रहते रिक्त पदों को भरा जा सके। भविष्य में इस तरह की दुर्घटनाओं को रोकने और उपभोक्ताओं को सुरक्षित बिजली मुहैया कराने के लिए तकनीकी बल का सुदृढ़ीकरण अति आवश्यक माना जाता है। जब तक मैदानी स्तर पर पर्याप्त और अनुभवी कर्मचारियों की सीधी भर्ती नहीं की जाएगी, तब तक इस तरह की व्यवस्थागत समस्याओं से पूरी तरह निजात पाना संभव नहीं होगा।